हेग (नीदरलैंड), 23 सितम्बर (एपी) संयुक्त राष्ट्र की एक निकाय द्वारा नियुक्त विशेषज्ञों सहित बढ़ती संख्या में विशेषज्ञों ने कहा है कि गाज़ा पट्टी में इज़राइल का सैन्य अभियान नरसंहार के बराबर है। इससे इज़राइल की वैश्विक स्तर पर अलगाव की स्थिति गहरी हो रही है और उसके अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के बीच भी छवि को गहरा नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ गया है।
इज़राइल इस आरोप का सख्ती से खंडन करता है। उसका कहना है कि यह देश आंशिक रूप से होलोकॉस्ट के बाद यहूदियों के लिए शरणस्थल के रूप में स्थापित हुआ था। कई अन्य विशेषज्ञों ने भी इस पर असहमति जताई है या कहा है कि ऐसा निर्धारण केवल अदालत ही कर सकती है।
फिर भी, बीते महीनों में इज़राइल की युद्धकालीन गतिविधियों को लेकर वैश्विक आक्रोश बढ़ा है। भूख से मरते बच्चों की तस्वीरें सामने आने के बाद गाज़ा में मानवीय संकट और गहरा गया है। 23 महीने से जारी युद्ध ने दसियों हज़ार फ़िलिस्तीनियों की जान ली है और गाज़ा का बड़ा हिस्सा तबाह कर दिया है।
गाज़ा के सबसे बड़े शहर में मौजूदा अभियान ने और चिंता बढ़ा दी है, जिसे यूरोपीय सहयोगियों ने भी आलोचना की है। लेकिन नरसंहार का आरोप इससे आगे बढ़कर सवाल खड़ा करता है कि क्या होलोकॉस्ट के बाद बने इस देश पर अब वही अपराध करने का आरोप लग रहा है।
इज़राइली नेता इस तर्क को परोक्ष यहूदी-विरोध बताते हैं और कहते हैं कि देश अंतरराष्ट्रीय क़ानून का पालन करता है तथा बड़े सैन्य अभियानों से पहले गाज़ा के नागरिकों को निकालने की अपील करता है। उनका कहना है कि 7 अक्टूबर, 2023 को हुआ हमास का हमला, जिसने युद्ध को जन्म दिया, स्वयं एक नरसंहार था।
उस हमले में हमास समर्थित उग्रवादियों ने लगभग 1,200 लोगों की हत्या की थी, जिनमें ज़्यादातर नागरिक थे, और 251 को अगवा कर लिया था। अब भी 48 बंधक गाज़ा में हैं, जिनमें से लगभग 20 को इज़राइल जीवित मानता है।
इज़राइल की जवाबी कार्रवाई ने गाज़ा के बड़े हिस्से को खंडहर बना दिया है और कई इलाकों में अकाल जैसी स्थिति पैदा कर दी है। इज़राइली नेताओं ने फ़िलिस्तीनियों के बड़े पैमाने पर विस्थापन का भी समर्थन किया है, जिसे जबरन निष्कासन कहा जा रहा है।
गाज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि अब तक 65,000 से अधिक फ़िलिस्तीनी मारे जा चुके हैं। मंत्रालय, जो हमास प्रशासन का हिस्सा है लेकिन पेशेवर चिकित्सकों द्वारा संचालित है, यह नहीं बताता कि कितने नागरिक और कितने लड़ाके थे, लेकिन कहता है कि लगभग आधे महिलाएँ और बच्चे हैं।
नरसंहार की परिभाषा
नरसंहार की परिभाषा 1948 के सम्मेलन में की गई थी, जो होलोकॉस्ट के बाद तैयार हुआ था। इसके अनुसार, यदि किसी राष्ट्रीय, जातीय, नस्लीय या धार्मिक समूह को पूरी तरह या आंशिक रूप से नष्ट करने की मंशा से हत्या, गंभीर शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुँचाना, या ऐसी जीवन स्थितियाँ पैदा करना जिनसे उनका अस्तित्व समाप्त हो जाए—तो उसे नरसंहार माना जाएगा।
विशेषज्ञ और मानवाधिकार संगठन ‘नरसंहार’ शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं
पिछले हफ्ते, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक टीम ने रिपोर्ट दी कि यह युद्ध अब फ़िलिस्तीनी जनसंख्या को नष्ट करने का प्रयास बन चुका है और नरसंहार की श्रेणी में आता है।
इसी तरह, कई प्रमुख नरसंहार विशेषज्ञों ने भी यही निष्कर्ष निकाला है। ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ओमर बार्टोव, जो पहले मानते थे कि यह नरसंहार नहीं है, अब इसे “नरसंहारात्मक अभियान” मानते हैं। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने भी इसी महीने इसे नरसंहार कहा।
इज़राइल की दो मानवाधिकार संस्थाओं, एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी इसे नरसंहार करार दिया।
अन्य लोग मानते हैं यह अदालत का मामला है
कई विद्वान और नेता कहते हैं कि नरसंहार की पुष्टि करना केवल अदालत का अधिकार है। ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने भी यही रुख अपनाया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतरेस ने भी कहा कि यह राजनेताओं या विद्वानों का नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय अदालतों का निर्णय है।
2023 के अंत में, दक्षिण अफ्रीका ने इज़राइल पर नरसंहार का आरोप अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) में लगाया। दर्जनों देश इस मामले में शामिल हो चुके हैं। हालांकि, अंतिम निर्णय आने में वर्षों लग सकते हैं।
इज़राइल पर बढ़ता दबाव
भले ही सभी देश इसे नरसंहार न मानते हों, इज़राइल पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। सांस्कृतिक और खेल क्षेत्रों में बहिष्कार की आवाज़ें उठ रही हैं, यूरोपीय देशों में प्रदर्शन हो रहे हैं। यूरोपीय आयोग ने इज़राइल के साथ व्यापारिक संबंध आंशिक रूप से निलंबित करने का प्रस्ताव रखा है। जर्मनी और ब्रिटेन ने भी कुछ सैन्य निर्यात पर रोक लगाई है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ‘नरसंहार’ केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से भी बेहद भारी शब्द है। एक देश पर नरसंहार का ठप्पा लगने के बाद उसका असर हमेशा बना रहता है।
(एपी)
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