नई दिल्ली, 29 अक्टूबर (PTI) भारत हर वर्ष करीब 1.2 करोड़ युवाओं को कार्यबल में शामिल होते देख रहा है, लेकिन इनमें से केवल लगभग 10 प्रतिशत को ही किसी प्रकार की ‘ग्रीन स्किलिंग’ प्राप्त हो रही है। एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इस स्थिति के चलते भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का पूरा लाभ उठाने में असफल हो सकता है, जबकि 2047 तक देश में 3.5 करोड़ तक ग्रीन नौकरियां उत्पन्न होने की क्षमता है।
UNICEF यूवा द्वारा जारी ‘यूथ फॉर ए सस्टेनेबल इंडिया: ग्रीन स्किल्स एंड एम्प्लॉयमेंट पाथवे’ रिपोर्ट कैपजेमिनी, सेक्टर स्किल काउंसिल फॉर ग्रीन जॉब्स (SCGJ), काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) और सत्वा के सहयोग से तैयार की गई है। रिपोर्ट में बताया गया कि वैश्विक स्तर पर 2022 से 2023 के बीच कम से कम एक ग्रीन कौशल की मांग में 22.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि ऐसे कौशल रखने वाले कार्यबल में केवल 12.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जिससे मांग और प्रतिभा के बीच असमानता बढ़ती जा रही है।
अध्ययन के अनुसार भारत में 808 मिलियन (80.8 करोड़) लोग 35 वर्ष से कम आयु के हैं और ऐसे में ग्रीन स्किलिंग में पिछड़ना भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान खाई के पीछे कई संरचनात्मक कारक जिम्मेदार हैं। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगर ग्रीन जॉब्स के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं, जबकि जयपुर, इंदौर, विशाखापत्तनम, अहमदाबाद, कोयंबटूर, भुवनेश्वर और चंडीगढ़ जैसे टियर-2 एवं टियर-3 शहर आने वाले वर्षों में 40 प्रतिशत तक ग्रीन नौकरियों में योगदान देंगे, लेकिन इन क्षेत्रों में प्रशिक्षण अवसंरचना अभी भी अपर्याप्त है। परंपरागत स्किलिंग कार्यक्रम अभी भी पुराने उद्योगों पर केंद्रित हैं और जलवायु-लचीली तकनीकों, डिजिटल या परिपत्र अर्थव्यवस्था के अनुरूप कौशलों को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं करते। वहीं ग्रामीण और वंचित तबके के युवाओं के सामने परिवहन, आर्थिक सहायता और इंडस्ट्री से जुड़ाव की कमी जैसी बाधाएँ मौजूद हैं।
रिपोर्ट में कृषि, निर्माण, वस्त्र, कचरा प्रबंधन और इलेक्ट्रिक वाहन (EV) क्षेत्रों को ग्रीन नौकरियों के लिए प्राथमिक सेक्टर के रूप में चिन्हित किया गया है और सुझाव दिया गया है कि नीतिगत, औद्योगिक और सामाजिक स्तर पर समन्वित कदम उठाकर एक समावेशी हरित परिवर्तन सुनिश्चित किया जाए। अध्ययन के तहत 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के 670 युवाओं पर कराए गए सर्वे में केवल 37 प्रतिशत युवाओं ने बताया कि वे ग्रीन सेक्टर या सतत विकास से जुड़े रोजगार अवसरों के बारे में जानकारी रखते हैं। वहीं फोकस ग्रुप चर्चा में महिलाओं और वंचित समुदाय के युवाओं के सामने आवाजाही, सुरक्षा और मार्गदर्शन की चुनौतियों को भी रेखांकित किया गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीन नौकरियाँ बेहतर वेतन उपलब्ध कराती हैं—सामान्य नौकरियों की तुलना में पुरुषों को 7 प्रतिशत और महिलाओं को 12 प्रतिशत अधिक वेतन मिलता है और ऐसे क्षेत्रों में लैंगिक वेतन अंतर भी कम है। इसके बावजूद महिलाओं की भागीदारी इन उभरते क्षेत्रों में अब भी कम है, जिसके लिए लैंगिक-संवेदनशील प्रशिक्षण, सुरक्षा और मेंटरशिप कार्यक्रम जरूरी बताए गए हैं।
कृषि क्षेत्र में जलवायु-स्मार्ट खेती और युवा आधारित कृषि सहकारिता को बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है। निर्माण क्षेत्र में 2030 तक 60 करोड़ से अधिक भारतीयों के शहरों में रहने का अनुमान है, इसलिए ग्रीन बिल्डिंग डिजाइन, जल-कार्यक्षम प्रणालियाँ और कम कार्बन सामग्री जैसे कौशलों की मांग तेजी से बढ़ेगी। वस्त्र उद्योग में सतत फैशन, टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग और स्वच्छ विनिर्माण तकनीकों पर जोर देने की आवश्यकता बताई गई है। कचरा प्रबंधन में 6.2 करोड़ टन सालाना कचरा निपटान से जुड़े अनौपचारिक श्रमिकों के औपचारिककरण और युवाओं को रीसाइक्लिंग तथा परिपत्र अर्थव्यवस्था से जुड़े नवाचारों के लिए तैयार किए जाने की जरूरत है। वहीं EV सेक्टर में बैटरी असेंबली, सर्विसिंग तथा चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में मानकीकृत प्रशिक्षण और AI आधारित तकनीक को शामिल करने पर जोर दिया गया है।
कौशल अंतर को दूर करने के लिए रिपोर्ट ने राष्ट्रीय ‘ग्रीन स्किल्स एंड जॉब्स डैशबोर्ड’ बनाने, कम आय वाले युवाओं के लिए वजीफा एवं शुल्क में रियायत जैसी सुविधाएँ देने तथा उद्योगों को CSR निवेश के माध्यम से ग्रीन स्किलिंग बढ़ाने की सिफारिश की। साथ ही छोटे शहरों के लिए ऐप आधारित मॉड्यूलर प्रशिक्षण और महिलाओं हेतु विशेष मेंटरशिप नेटवर्क को सुलभ बनाने की अनुशंसा की गई। PTI
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