नई दिल्ली, 6 नवंबर (PTI) – दो नए अध्ययनों के अनुसार, भारत में 2047 तक लगभग 1.1 करोड़ टन सौर पैनलों का कचरा उत्पन्न होने की संभावना है। यह अधिकतर क्रिस्टलाइन-सिलिकॉन मॉड्यूल से आएगा। इसके प्रबंधन के लिए देश में लगभग 300 रीसाइक्लिंग प्लांट बनाने और लगभग 4,200 करोड़ रुपये का निवेश करने की आवश्यकता होगी।
अध्ययन में यह भी बताया गया कि अगर पुराने सौर पैनलों से सिलिकॉन, तांबा, एल्यूमिनियम और चांदी जैसी सामग्री को पुनः प्राप्त किया जाए, तो इससे 2047 तक 3,700 करोड़ रुपये का बाजार तैयार हो सकता है। इससे न केवल संसाधनों की बचत होगी बल्कि कार्बन उत्सर्जन में भी 3.7 करोड़ टन की कमी आ सकती है।
वर्तमान में भारत में सौर मॉड्यूल रीसाइक्लिंग का काम बहुत शुरुआती चरण में है और केवल कुछ ही रीसाइक्लर्स काम कर रहे हैं। CEEW के अध्ययन ने भारत में सौर रीसाइक्लिंग के लिए पहला व्यापक मार्गदर्शन दिया है, जो स्वच्छ ऊर्जा और घरेलू उत्पादन दोनों को मजबूत करेगा।
CEEW के फेलो ऋषभ जैन ने कहा, “सौर ऊर्जा क्रांति भारत के लिए नई हरित औद्योगिक संभावनाएँ ला सकती है। कचरे को पुनः उपयोग में लाकर हम महत्वपूर्ण खनिज वापस पा सकते हैं, नौकरियाँ पैदा कर सकते हैं और स्वच्छ ऊर्जा प्रणाली को मजबूत कर सकते हैं।”
अध्ययन में यह भी बताया गया कि अभी रीसाइक्लिंग व्यवसाय लाभदायक नहीं है। रीसाइक्लर्स को प्रति टन लगभग 10,000–12,000 रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है। सबसे बड़ी लागत है पुराने पैनल खरीदना, जो कुल लागत का लगभग दो-तिहाई है। इसके अलावा, प्रसंस्करण, संग्रह और निपटान की भी लागत आती है।
रीसाइक्लिंग को लाभकारी बनाने के लिए पैनल की कीमत 330 रुपये से कम होनी चाहिए या फिर रीसाइक्लर्स को EPR (Extended Producer Responsibility) प्रमाणपत्र, कर में छूट और अनुसंधान में निवेश का समर्थन मिलना चाहिए।
CEEW की कार्यक्रम प्रमुख आकांक्षा त्यागी ने कहा, “सौर रीसाइक्लिंग भारत के लिए स्वच्छ ऊर्जा और निर्माण के बीच पुल का काम कर सकती है। यह कचरा प्रबंधन से ज्यादा है। इससे पैनलों को आसानी से पुनः प्राप्त करने, सामग्री को साफ करने और नई आर्थिक गतिविधियों के लिए अवसर मिलेगा।”
अध्ययन में सुझाव दिया गया कि पर्यावरण मंत्रालय के तहत ई-कचरा नियम 2022 के अनुसार EPR लक्ष्य तय किए जाएँ और नई एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के तहत सर्कुलर सौर टास्कफोर्स बनाकर नीति, वित्त और उद्योग के कार्यों को समन्वित किया जाए। इसके अलावा, केंद्रीय सौर इन्वेंट्री तैयार कर कचरे के हॉटस्पॉट की पहचान की जाए और उत्पादकों से पैनल को आसानी से अलग करने के लिए डिज़ाइन साझा करने को कहा जाए।
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