राष्ट्रीय पैनल ने भारत की ‘बंजर भूमि’ श्रेणीकरण में तत्काल सुधार की मांग की, कहा—देश में कोई भी भूमि वास्तव में ‘बेकार’ नहीं

National Panel Urges Urgent Reclassification of India’s ‘Wastelands’, Says No Land Is Truly Waste

वेस्टब्रिज समर्थित सेंटर फॉर पॉलिसी डिज़ाइन (CPD)–ATREE द्वारा गठित एक उच्चस्तरीय राष्ट्रीय पैनल ने भारत की औपनिवेशिक दौर की “बंजर भूमि (वेस्टलैंड)” श्रेणीकरण पद्धति को पूरी तरह बदलने की मांग की है। पैनल का कहना है कि घासभूमि, वेटलैंड, चरागाह, और ओरन व गोचर जैसी सामुदायिक भूमि न केवल पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि हर साल 5–7 लाख करोड़ रुपये की आर्थिक सेवाएँ भी प्रदान करती हैं। यह चर्चा नई दिल्ली में आयोजित 9वें इंडिया लैंड डेवलपमेंट कॉन्फ्रेंस (ILDC) के दौरान हुई, जिसमें ग्रामीण विकास मंत्रालय, सेंटर फॉर पैस्टोरलिज़्म, फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी, ISRO–स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर, IUCN/FLR, सेंटर फॉर सोशल इकोलॉजी और ATREE–CPD के विशेषज्ञ शामिल हुए।

“Reimagining ‘Wastelands’ of India: Policy Discussions for Arid Commons” सत्र में कुनाल सत्यार्थी (IFS, संयुक्त सचिव, ग्रामीण विकास मंत्रालय), मनीष परमार (ISRO–SAC), अनिरुद्ध शेट (सेंटर फॉर पैस्टोरलिज़्म), शुभ्रत सिंह (FES), अर्चना चटर्जी (IUCN/FLR) और डॉ. पुर्णेन्दु कावूरी (सेंटर फॉर सोशल इकोलॉजी) ने अपने विचार रखे। विशेषज्ञों ने बताया कि खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र—जैसे घासभूमि, चराई क्षेत्र, वेटलैंड, गाँव की साझा भूमि—को “वेस्ट” मानने के बजाय सही तरीके से चिह्नित, मूल्यांकित और भूमि शासन ढांचे में शामिल किया जाना चाहिए।

सत्र का संचालन कर रहे CPD–ATREE के निदेशक डॉ. एबी टी. वानक ने कहा, “वेस्टलैंड शब्द ही भ्रामक है। इससे यह गलत संदेश जाता है कि ऐसे भू-भाग बेकार पड़े हैं और उन्हें विकास या प्लांटेशन के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। वास्तव में घासभूमि, सवाना, अर्ध–शुष्क भूमि, रेगिस्तान और वेटलैंड अत्यंत महत्वपूर्ण जैवविविधता वाले क्षेत्र हैं, जो कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। गाँव की सामुदायिक भूमि 5–7 लाख करोड़ रुपये मूल्य की सेवाएँ देती हैं, जिन्हें ठीक से दर्ज और प्रबंधित किया जाना चाहिए।” उन्होंने कहा कि इन्हें केवल निर्माण या प्लांटेशन के लिए उपयुक्त भूमि मानना ग्रामीण आजीविका और पशुपालक समुदायों की गतिशीलता को नुकसान पहुँचाता है।

वर्तमान में भारत के खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का केवल 5% हिस्सा संरक्षित क्षेत्र (Protected Areas Network) में आता है, जबकि लगभग 70% को “वेस्टलैंड” घोषित किया गया है। पैनल ने कहा कि यह पुरानी प्रणाली अस्पष्ट स्वामित्व और शासन का कारण बनती है, जिससे सामुदायिक भूमि को विकास परियोजनाओं के लिए डायवर्ट किया जाता है और घासभूमियों पर प्रतिपूरक वनीकरण (compensatory afforestation) के नाम पर पेड़ लगा दिए जाते हैं।

कुनाल सत्यार्थी ने बताया कि सामुदायिक भूमि “विभागों, श्रेणियों और डाटा सिस्टमों के बीच फँस जाती है”, जिसके कारण नीति–निर्माण में इसकी उपेक्षा होती है। उन्होंने साझा उपयोग, मौसमी उपयोग और गतिशीलता को मान्यता देने वाली एकीकृत भूमि–शासन प्रणाली की आवश्यकता बताई।

पैनल ने उपग्रह डेटा, चरवाहों की आवाजाही के मार्ग और मौसमी भूमि उपयोग को एकीकृत करने वाला एक राष्ट्रीय मैपिंग पोर्टल तैयार करने का सुझाव दिया। विशेषज्ञों ने बताया कि पशुपालक समुदायों की गतिशीलता पर आधारित मैपिंग ने पहले ही यह दिखा दिया है कि ये परिदृश्य हर साल लगभग ₹1.3 लाख करोड़ की आर्थिक सेवाएँ उत्पन्न करते हैं। भूमि ह्रास–तटस्थता, बॉन चैलेंज, CBD का 30×30 लक्ष्य, और भारत की जलवायु संबंधी प्रतिबद्धताएँ (NDCs) भी आम भूमि (commons) की सही पहचान और सुरक्षा से काफी मजबूत हो सकती हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि इन परिदृश्यों को OECMs के रूप में मान्यता देकर और इनके पारिस्थितिक सेवाओं—जिनकी कीमत 90–110 अरब डॉलर सालाना है—को आधिकारिक रूप से गिना जाए तो यह जलवायु और विकास दोनों लक्ष्यों को आगे बढ़ाएगा।

चर्चा का समापन ऐसे राष्ट्रीय एटलस की मांग के साथ हुआ, जिसमें भूमि उपयोग, स्वामित्व, और पारिस्थितिक डेटा को एकीकृत करते हुए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाए, ताकि बुनियादी ढाँचा योजना बेहतर हो, अवैध भूमि–हस्तांतरण रोका जा सके, और पुराने प्रशासनिक त्रुटियों को सुधारा जा सके। पैनल ने चेतावनी दी कि गलत श्रेणीकरण के कारण भारत अपूरणीय पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से खो रहा है, जिससे जैव–विविधता हानि, आजीविका संकट, और अप्रभावी वनीकरण जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं।

(अस्वीकरण: यह प्रेस विज्ञप्ति PNN के माध्यम से जारी की गई है। पीटीआई इसकी किसी भी सामग्री की संपादकीय ज़िम्मेदारी नहीं लेता।) पीटीआई

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