भारत समृद्धि के लिए प्रदूषण का रास्ता नहीं अपना सकता: कांग्रेस

**EDS: THIRD PARTY IMAGE; SCREENGRAB VIA SANSAD TV** New Delhi: Congress MP Jairam Ramesh speaks in the Rajya Sabha during the Winter session of Parliament, in New Delhi, Wednesday, Dec. 10, 2025. (Sansad TV via PTI Photo)(PTI12_10_2025_000186B)

नई दिल्ली, 15 दिसंबर (पीटीआई) —कांग्रेस ने सोमवार को कहा कि भारत समृद्धि हासिल करने के लिए प्रदूषण का सहारा नहीं ले सकता और यह कि तेज आर्थिक विकास की कीमत के तौर पर बढ़ते प्रदूषण को नागरिकों पर नहीं थोपा जाना चाहिए।

एक बयान में कांग्रेस के संचार प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि भारत में स्वच्छ हवा से जुड़ी कार्रवाई केवल ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) तक सीमित नहीं रह सकती, क्योंकि ये योजनाएं अधिकतर प्रतिक्रियात्मक होती हैं और संकट की रोकथाम के बजाय संकट प्रबंधन पर केंद्रित रहती हैं।

उन्होंने कहा,

“हमें पूरे साल, केवल सर्दियों के महीनों में ही नहीं, बल्कि बड़े पैमाने और तेज़ी के साथ बहु-क्षेत्रीय कड़े कदम उठाने की जरूरत है।” उन्होंने जोर दिया कि प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास निरंतर और व्यापक होने चाहिए।

राज्यसभा में 9 दिसंबर 2025 को मोदी सरकार द्वारा दिए गए उस बयान का उल्लेख करते हुए, जिसमें कहा गया था कि वायु प्रदूषण को सीधे तौर पर मौतों या बीमारियों से जोड़ने वाला कोई निर्णायक डेटा नहीं है, रमेश ने सरकार पर “चौंकाने वाली असंवेदनशीलता” का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यह इस तरह का दूसरा इनकार है, इससे पहले जुलाई 2024 में भी ऐसा ही बयान दिया गया था।

वैज्ञानिक अध्ययनों का हवाला देते हुए रमेश ने कहा कि जुलाई 2024 की लैंसेट रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल मौतों में से 7.2 प्रतिशत मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी हैं, जो केवल 10 शहरों में ही हर साल लगभग 34,000 मौतों के बराबर है। उन्होंने अगस्त 2024 में अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान (IIPS) के एक अध्ययन का भी उल्लेख किया, जिसमें राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों से अधिक प्रदूषण वाले जिलों में वयस्कों की समय से पहले मृत्यु में 13 प्रतिशत की वृद्धि और बच्चों की मृत्यु दर में लगभग 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी पाई गई।

दिसंबर 2024 में द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के अनुसार, प्रदूषित हवा के लंबे समय तक संपर्क में रहने से भारत में हर साल अनुमानित 15 लाख अतिरिक्त मौतें होती हैं, यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सुरक्षा मानकों की तुलना की जाए। वहीं, नवंबर 2025 में इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि भारत में लगभग 20 लाख मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं, जो वर्ष 2000 के मुकाबले 43 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती हैं।

रमेश ने कहा कि राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक, जिन्हें आखिरी बार 2009 में अपडेट किया गया था, अब पुराने हो चुके हैं और उनका सही ढंग से पालन भी नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि वर्तमान PM2.5 मानक WHO के दिशा-निर्देशों से कहीं अधिक हैं। 2017 में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) शुरू होने के बावजूद प्रदूषण स्तर लगातार बढ़ता रहा है, इसलिए इस कार्यक्रम में पूरी तरह से सुधार की आवश्यकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 जैसे कानूनों की दोबारा समीक्षा की जानी चाहिए और आरोप लगाया कि पिछले एक दशक में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को कमजोर किया गया है। बिजली संयंत्रों और अन्य क्षेत्रों को दी गई उत्सर्जन मानकों में ढील को भी वापस लिया जाना चाहिए।

“भारत किसी भी सूरत में समृद्धि के लिए प्रदूषण का रास्ता नहीं अपना सकता,” रमेश ने दोहराया।

इस बीच, सोमवार को भी दिल्ली घने स्मॉग की चपेट में रही और वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 498 तक पहुंच गया, जो ‘गंभीर’ श्रेणी में आता है।

अस्वीकरण: यह लेख पूरी तरह पीटीआई द्वारा उपलब्ध कराई गई समाचार फीड पर आधारित है।

— चारु