चेन्नई, 17 दिसंबर (पीटीआई) — दो दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन ओलंपिक पदक के बेहद करीब पहुंचकर उसे हासिल न कर पाने का अफसोस आज भी मोहम्मद रियाज़ के मन में टीस की तरह मौजूद है। हालांकि, हाल के दो ओलंपिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम के पोडियम पर पहुंचने से उनके इस दर्द में कुछ हद तक मरहम लगा है।
तमिलनाडु के 53 वर्षीय पूर्व मिडफील्डर रियाज़ 1998 के एशियाई खेलों में भारत की उस टीम का हिस्सा थे, जिसने 32 साल के लंबे इंतज़ार के बाद स्वर्ण पदक जीता था। लेकिन 2000 सिडनी ओलंपिक में टीम क्वार्टरफाइनल में बाहर हो गई और उसी प्रदर्शन को दोहरा नहीं सकी।
‘पीटीआई भाषा’ से बातचीत में रियाज़ ने कहा, “ओलंपिक खेलना अपने आप में सबसे बड़ी बात है। पदक के इतने करीब पहुंचकर उसे न जीत पाना मेरे जीवन का सबसे बड़ा अफसोस है। यह अफसोस जिंदगी भर रहेगा, लेकिन इस बात की खुशी है कि भारत ने 2021 टोक्यो और 2024 पेरिस ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर इतने लंबे इंतज़ार को खत्म किया।”
साल 2000 में भारत सेमीफाइनल में जगह बनाने से महज़ दो मिनट दूर था, लेकिन पोलैंड के आख़िरी क्षणों में किए गए बराबरी के गोल ने उसकी उम्मीदें तोड़ दी थीं। इसके बाद 2004 एथेंस ओलंपिक में भारतीय टीम प्रभाव नहीं छोड़ सकी और 2008 बीजिंग ओलंपिक के लिए क्वालीफाई भी नहीं कर पाई।
हॉकी विशेषज्ञों का मानना है कि 2000 की भारतीय टीम सबसे संतुलित और 1980 मॉस्को ओलंपिक में जीते गए आख़िरी स्वर्ण पदक के बाद पोडियम तक पहुंचने की सबसे मज़बूत दावेदार थी। उस टीम में धनराज पिल्लै, मुकेश कुमार, दिलीप तिर्की, बलजीत सैनी और मोहम्मद रियाज़ जैसे दिग्गज खिलाड़ी शामिल थे।
रियाज़ का मानना है कि लगातार दो ओलंपिक पदक जीतकर भारतीय हॉकी सही राह पर लौट आई है और अब भविष्य में पदक के रंग को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा, “भारतीय हॉकी ने 100 साल पूरे कर लिए हैं और यह एक लंबा सफर रहा है। लगातार ओलंपिक पदक जीतना अच्छा लगता है। हमारे पास जमीनी स्तर पर एक मज़बूत और दीर्घकालिक योजना है।”
उन्होंने आगे कहा, “पहले हम रैंकिंग में सातवें या आठवें स्थान पर रहते थे, लेकिन अब हम शीर्ष पांच में हैं। इससे साफ है कि ग्राफ ऊपर जा रहा है। हमें विश्व कप, एशियाई खेल और ओलंपिक पर फोकस बनाए रखना होगा।”
रियाज़ ने कहा कि अब टीम में किसी भी विश्व स्तरीय टीम से मुकाबला करने का आत्मविश्वास है। “हम ओलंपिक में शीर्ष तीन में आ सकते हैं, लेकिन इसके लिए कड़ी मेहनत ज़रूरी है। अनुभव और युवा खिलाड़ियों के सही संतुलन के साथ हमें 2028 लॉस एंजिलिस ओलंपिक के फाइनल तक पहुंचने का लक्ष्य रखना चाहिए।”
उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले साल अगस्त में नीदरलैंड्स और बेल्जियम में होने वाले विश्व कप से पहले कुछ जूनियर खिलाड़ियों को सीनियर टीम में मौका मिलेगा। “हमारी सीनियर टीम बहुत अच्छी है, लेकिन कुछ खिलाड़ी काफी लंबे समय से खेल रहे हैं। जूनियर खिलाड़ियों को भी अवसर देना होगा और विश्व कप के लिए एक दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी,” उन्होंने कहा।
तमिलनाडु हॉकी एसोसिएशन की चयन समिति के अध्यक्ष रियाज़ का मानना है कि शीर्ष टीमों के खिलाफ खेलते समय भारतीय खिलाड़ियों को मानसिक दबाव में नहीं आना चाहिए और गोल करने के मौकों को भुनाने पर खास काम करना होगा। उन्होंने कहा, “जर्मनी जैसी टीम के खिलाफ खेलते समय उसकी चैंपियन वाली छवि से डरना नहीं चाहिए। अगर हम मानसिक बाधा के बिना खेलें तो किसी भी टीम को हरा सकते हैं।”
उन्होंने कहा, “हम शीर्ष लीग में हैं, लेकिन यूरोपीय टीमों और हमारे बीच फर्क यह है कि वे डी के अंदर मिलने वाले मौकों को गोल में बदल लेती हैं, जबकि हम कई मौके गंवा देते हैं। कड़े मुकाबलों में दो-तीन मौके ही मिलते हैं और उन्हें गंवाने की गुंजाइश नहीं होती।”
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