भारत का ‘अगला कोविड’: डॉक्टरों का कहना— वायु प्रदूषण ही असली स्वास्थ्य आपातकाल

New Delhi: Pedestrians wear masks as a layer of smog engulfs the city amid deterioration in the capital's air quality, in New Delhi, Thursday, Dec. 18, 2025. The 24-hour average AQI was recorded in the 'very poor' category on Thursday with a reading of 373, up from 334 a day earlier, according to official data. (PTI Photo/Arun Sharma)(PTI12_18_2025_000435B)

नई दिल्ली, 26 दिसंबर (PTI) — वायु प्रदूषण महामारी के बाद से भारत के सामने खड़ी सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है और यदि तुरंत ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह हर साल और गंभीर होती जाएगी। ब्रिटेन में कार्यरत भारतीय मूल के एक फेफड़ा रोग विशेषज्ञ ने चेतावनी देते हुए कहा कि श्वसन रोगों की एक “आसन्न सुनामी” बड़े पैमाने पर अब भी अनपहचानी और बिना इलाज के बनी हुई है।

PTI से बातचीत में यूके में प्रैक्टिस कर रहे कई वरिष्ठ डॉक्टरों ने कहा कि बिना निदान वाले श्वसन रोगों का एक विशाल, छिपा बोझ “सतह के नीचे बनता जा रहा है” और इसकी आने वाली लहर भारतीय नागरिकों तथा देश की स्वास्थ्य प्रणाली पर भारी और दीर्घकालिक असर डालेगी।

डॉक्टरों ने पिछले एक दशक में हृदय रोगों में वैश्विक वृद्धि को केवल मोटापे से नहीं, बल्कि शहरी परिवहन—खासकर ऑटोमोबाइल और विमानों—से निकलने वाले विषाक्त उत्सर्जनों के बढ़ते संपर्क से जोड़ा। यह समस्या भारत, ब्रिटेन और अन्य देशों के शहरों में स्पष्ट है।

केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने मंगलवार को स्वीकार किया कि दिल्ली में लगभग 40 प्रतिशत प्रदूषण परिवहन क्षेत्र से आता है, जो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता का परिणाम है। उन्होंने स्वच्छ विकल्पों की तात्कालिक जरूरत पर जोर देते हुए जैव ईंधन अपनाने की वकालत की।

हाल ही में संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान सरकार ने कहा कि उच्च एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) और फेफड़ों की बीमारियों के बीच सीधे संबंध को स्थापित करने वाला निर्णायक डेटा उपलब्ध नहीं है, हालांकि यह माना गया कि वायु प्रदूषण श्वसन रोगों और संबंधित बीमारियों के लिए एक ट्रिगर कारक है।

लिवरपूल के कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजिस्ट और भारत की कोविड-19 सलाहकार समिति के पूर्व सदस्य डॉ. मनीष गौतम ने PTI से कहा, “वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने पर सरकार का नया फोकस जरूरी और देर से आया कदम है। लेकिन अब एक असहज सच्चाई का सामना करना होगा—उत्तर भारत में रहने वाले लाखों लोगों के लिए नुकसान पहले ही हो चुका है। अभी जो प्रबंधन दिख रहा है, वह हिमखंड का केवल सिरा है। श्वसन मार्ग से जुड़ी बीमारियों का एक विशाल, छिपा बोझ सतह के नीचे बन रहा है।”

उन्होंने चेतावनी दी कि वर्षों तक के संपर्क के कारण फेफड़ों से जुड़ा स्वास्थ्य आपातकाल उभर रहा है और नीति-निर्माताओं से शुरुआती पहचान व उपचार पर ध्यान देने तथा एक त्वरित “लंग हेल्थ टास्क ग्रुप” बनाने का आग्रह किया।

डॉक्टरों के अनुसार, दिसंबर में अकेले दिल्ली के अस्पतालों में श्वसन रोगियों की संख्या में 20 से 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई, जिनमें कई पहली बार सामने आए मामले और युवा वयस्क शामिल थे।

यूके की नेशनल हेल्थ सर्विस में 20 से अधिक वर्षों का अनुभव रखने वाले गौतम ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण और रोकथाम उपाय महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अब वे अकेले पर्याप्त नहीं हैं। “भारत ने पहले भी बड़े पैमाने पर सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप कर दिखाए हैं। तपेदिक के प्रभाव को शुरुआती निदान और संरचित उपचार कार्यक्रमों से काफी कम किया गया है। अब श्वसन रोगों के लिए भी इसी स्तर की तात्कालिकता और निवेश की जरूरत है,” उन्होंने कहा।

हाल ही में संसद में सरकार ने फिर दोहराया कि वायु प्रदूषण और मृत्यु या बीमारी के बीच सीधे कारणात्मक संबंध को स्थापित करने वाला निर्णायक डेटा उपलब्ध नहीं है।

लंदन के सेंट जॉर्ज यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के मानद कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. राजय नारायण ने कहा कि वायु प्रदूषण को हृदय, श्वसन, न्यूरोलॉजिकल और प्रणालीगत रोगों से जोड़ने वाले “प्रचुर वैज्ञानिक साक्ष्य” मौजूद हैं और इस मुद्दे से निपटने में देरी स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों पर बोझ बढ़ाएगी।

उन्होंने कहा कि अल्पकालिक उपाय तत्काल संपर्क को कम कर सकते हैं, लेकिन वास्तविक समाधान विज्ञान-आधारित, दीर्घकालिक नीतियों में है जो स्वच्छ हवा को प्राथमिकता दें, संवेदनशील आबादी की रक्षा करें और सभी हितधारकों की जवाबदेही तय करें।

नारायण ने बताया, “सिरदर्द, थकान, हल्की खांसी, गले में जलन, पाचन संबंधी परेशानी, आंखों में सूखापन, त्वचा पर चकत्ते और बार-बार होने वाले संक्रमण जैसे शुरुआती लक्षण अक्सर मामूली समझकर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं, लेकिन ये गंभीर दीर्घकालिक रोगों के शुरुआती संकेत हो सकते हैं।”

संसद के शीतकालीन सत्र में स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में दिल्ली में तीव्र श्वसन रोग के 2 लाख से अधिक मामले दर्ज हुए, जिनमें करीब 30,000 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

बर्मिंघम के मिडलैंड मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट प्रो. डेरेक कॉनॉली ने कहा कि प्रदूषित शहरों में रहने वाले लोग साफ दिखने वाले दिनों में भी अदृश्य हृदय संबंधी जोखिमों के संपर्क में रहते हैं।

उन्होंने कहा, “हृदय रोग एक बेहद धीमी प्रक्रिया है, जिसमें कभी-कभी तेजी से बिगड़ने के दौर आते हैं। यह एक ‘साइलेंट किलर’ है। अधिकांश लोग अपने संपर्क से अनजान रहते हैं क्योंकि सूक्ष्म कण दिखाई नहीं देते और इन्हें रक्तचाप या कोलेस्ट्रॉल की तरह आसानी से मापा नहीं जा सकता। प्रदूषण कम दिखने वाले दिनों में भी हम इसके संपर्क में रहते हैं।”

कॉन्ली ने कहा कि पिछले दशक में हृदय रोगों में वृद्धि को भले मोटापे से जोड़ा गया हो, लेकिन उनका मानना है कि इसका बड़ा हिस्सा ऑटोमोबाइल और विमानों से हवा में फैलने वाले विषाक्त पदार्थों के कारण है।

‘द लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज’ की 2025 रिपोर्ट के अनुसार, PM2.5 प्रदूषण के कारण 2022 में भारत में 17 लाख से अधिक मौतें हुईं, जिनमें सड़क परिवहन में पेट्रोल के उपयोग से 2.69 लाख मौतें शामिल थीं।

मई में इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन के एक वैश्विक अध्ययन में बताया गया कि सड़क परिवहन उत्सर्जन को लक्षित नीतियां 2040 तक दुनिया भर में 19 लाख जानें बचा सकती हैं और 14 लाख नए बच्चों के अस्थमा मामलों को रोक सकती हैं।

वर्षों से स्वास्थ्य विशेषज्ञ वायु प्रदूषण के व्यापक प्रभावों की ओर ध्यान दिलाते रहे हैं और त्वरित हस्तक्षेप की आवश्यकता पर जोर देते आए हैं।

श्रेणी: ब्रेकिंग न्यूज़

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