जम्मू-कश्मीर की अदालत ने ‘आतंकी’ गतिविधियों के मामले में तीन आरोपियों को बरी किया

**EDS: THIRD PARTY IMAGE** In this image received on Dec. 27, 2025, army and security personnel keep a vigil as part of counter-terrorism operations at a snow-capped mountain range, in Jammu and Kashmir. Amid freezing temperatures and treacherous terrains, the Indian Army has intensified its counter-terrorism operations across Kishtwar and Doda districts in the union territory to pursue and neutralise Pakistani terrorists attempting to exploit the harsh winter for concealment, sources said on Saturday. (Indian Army via PTI Photo) (PTI12_27_2025_000492B)

श्रीनगर, 31 दिसंबर (पीटीआई) जम्मू-कश्मीर की एक सत्र अदालत ने सबूतों के अभाव में आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्तता के आरोप में मुकदमा झेल रहे तीन लोगों को बरी कर दिया है।

एनआईए अधिनियम के तहत नामित विशेष न्यायाधीश, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है।

कुलगाम जिले के निवासी वाजिद अहमद भट, मसरत बिलाल भुरू और रमीज अहमद डार को सोमवार को बरी कर दिया गया। न्यायाधीश मनजीत राय ने आदेश दिया कि यदि वे किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।

इन तीनों को 10 अक्टूबर 2022 को शहर के बटामालू क्षेत्र में एक चेकपोस्ट पर पुलिस ने गिरफ्तार किया था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि उनके पास से ग्रेनेड और जिंदा कारतूसों से भरी मैगजीन बरामद हुई थी।

अदालत ने कहा कि आपराधिक मुकदमे में अभियोजन पर यह दायित्व होता है कि वह अपना मामला संदेह से परे साबित करे, और केवल संदेह, चाहे वह कितना भी मजबूत क्यों न हो, सबूत का स्थान नहीं ले सकता।

न्यायाधीश ने कहा, “वर्तमान मामला इस बात को लेकर गंभीर विसंगतियों से भरा है कि आरोपियों को कैसे पकड़ा गया और वास्तव में किसके पास से क्या बरामद हुआ।”

उन्होंने कहा कि जब्त की गई वस्तुओं पर पहचान चिह्न या नंबर दर्ज न करना और सील के नमूनों को सुरक्षित न रखना, सबूतों की श्रृंखला को तोड़ देता है। साथ ही, ग्रेनेड को सील करने और बम निरोधक दस्ते के सामने पेश करने को लेकर भी विरोधाभासी साक्ष्य सामने आए।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि गवाह बार-बार आरोपियों की सही पहचान करने में असफल रहे और किसी विशेष ग्रेनेड को किसी विशेष आरोपी से जोड़ने में भी नाकाम रहे। इसके अलावा, अल-बद्र संगठन से कथित संबंध और आतंकी कृत्य की मंशा को लेकर यूएपीए के आरोपों के समर्थन में किसी स्वतंत्र गवाह या पुष्टिकरण साक्ष्य का पूरी तरह अभाव रहा।

न्यायाधीश के आदेश में कहा गया, “एक बार ऐसा संदेह उत्पन्न हो जाए तो आरोपियों को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए। यह अदालत मानती है कि अभियोजन यह सिद्ध करने में असफल रहा है कि 10.10.2022 को कमांड पोस्ट बटामालू में आरोपियों के पास कथित ग्रेनेड, मैगजीन और कारतूस सचेत और अवैध रूप से थे, और इसलिए शस्त्र अधिनियम की धारा 7/25 के तहत आरोप सिद्ध नहीं होते।”

आरोपियों की ओर से अधिवक्ता मीर उर्फी, वहीद अहमद डार और अनिल रैना ने पैरवी की। पीटीआई एमआईजे वीएन वीएन

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