समाजवादी जड़ों से कांग्रेस हाईकमान तक: सिद्धारमैया का रिकॉर्ड कार्यकाल तक का सफर

Raichur: Karnataka Chief Minister Siddaramaiah inaugurates 'Ambadevi Jatra Mahotsava' in Raichur District of Karnataka. Ministers Sharanaprakash Patil, Shivraj Tangadagi, Ramalingareddy, legislators Amaregouda Bayyapur and other leaders are also present. (@siddaramaiah/X via PTI Photo)(PTI01_03_2026_000354B)

बेंगलुरु, 6 जनवरी (पीटीआई) उपमुख्यमंत्री के साथ ‘कुर्सी’ को लेकर चली खींचतान के बाद कुछ असहज क्षणों का सामना करने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया अब एक अनोखे रिकॉर्ड के बेहद करीब हैं—कर्नाटक के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का।

दो दशकों से अधिक समय तक ‘जनता परिवार’ से जुड़े रहे और अतीत में कांग्रेस के मुखर विरोधी रहे 77 वर्षीय सिद्धारमैया के लिए यह एक उल्लेखनीय बदलाव है। मंगलवार को वह मैसूरु के ही देवरेज उर्स के मुख्यमंत्री पद पर बिताए गए दिनों के रिकॉर्ड की बराबरी कर रहे हैं।

अपने दूसरे कार्यकाल में सिद्धारमैया ने 2,792 दिन पूरे कर राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने के मामले में उर्स के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली है और 7 जनवरी से वह इस रिकॉर्ड के एकमात्र धारक बन जाएंगे।

देवरेज उर्स को राज्य में सामाजिक न्याय और भूमि सुधारों का प्रतीक माना जाता है। वह दो बार मुख्यमंत्री रहे थे (1972-1977 और 1978-1980)।

सिद्धारमैया, जो उर्स के बाद पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले एकमात्र मुख्यमंत्री भी हैं, ने अपने पहले कार्यकाल (13 मई 2013 से 15 मई 2018) में 1,829 दिन पूरे किए थे।

20 मई 2023 से शुरू हुए अपने दूसरे कार्यकाल में अब तक वह 963 दिन पूरे कर चुके हैं, हालांकि इस दौरान उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार के समर्थकों ने 2023 के कथित सत्ता-साझेदारी फॉर्मूले के तहत उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग कर दबाव बनाने की कोशिश भी की।

1980 के दशक की शुरुआत से 2005 तक, गरीब किसान परिवार से आने वाले सिद्धारमैया कट्टर कांग्रेस विरोधी रहे। लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा की अगुवाई वाली जद(एस) से निकाले जाने के बाद वह राजनीतिक चौराहे पर आ खड़े हुए और उसी पार्टी में शामिल हो गए, जिसका वे लंबे समय तक विरोध करते रहे थे।

अपने धैर्य और दृढ़ता के बल पर सिद्धारमैया ने 2013 में कांग्रेस की पसंद के रूप में मुख्यमंत्री बनने का जीवनभर का सपना पूरा किया। यही गुण और उनकी बेबाक शैली 2023 में उन्हें एक बार फिर शीर्ष पद तक ले आई।

सिद्धारमैया ने इस बात को कभी नहीं छिपाया कि वह मुख्यमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल आखिरी बार पूरा करना चाहते हैं और “उच्च नोट” पर विदा लेना चाहते हैं। हालांकि, चुनावी राजनीति में आगे बने रहने को लेकर उन्होंने मिले-जुले संकेत दिए हैं।

सिद्धारमैया ने कांग्रेस के कई दिग्गजों को पीछे छोड़कर मुख्यमंत्री बनने का श्रेय हासिल किया—2023 में डी के शिवकुमार और एक दशक पहले मल्लिकार्जुन खड़गे (वर्तमान में एआईसीसी अध्यक्ष) को।

2004 में त्रिशंकु जनादेश के बाद कांग्रेस और जद(एस) की गठबंधन सरकार बनी, जिसमें उस समय जद(एस) में रहे सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बने एन धरम सिंह का उपमुख्यमंत्री बनाया गया। सिद्धारमैया का मानना है कि उस समय उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौका मिल सकता था, लेकिन देवगौड़ा ने उनकी संभावनाओं पर पानी फेर दिया।

इसके बाद 2005 में, कर्नाटक की तीसरी सबसे बड़ी जाति कुरुबा समुदाय से आने वाले सिद्धारमैया ने खुद को पिछड़ा वर्ग नेता के रूप में स्थापित किया और अहिंदा (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित) सम्मेलनों का नेतृत्व किया। यह वही दौर था जब देवगौड़ा के बेटे एच डी कुमारस्वामी पार्टी के उभरते सितारे के रूप में देखे जा रहे थे।

सिद्धारमैया को जद(एस) से निकाल दिया गया, जहां वह पहले राज्य इकाई के अध्यक्ष रह चुके थे। पार्टी के आलोचकों का कहना था कि यह कदम कुमारस्वामी को आगे बढ़ाने के लिए उठाया गया।

उस समय अधिवक्ता रहे सिद्धारमैया ने “राजनीतिक संन्यास” की बात भी कही और वकालत में लौटने पर विचार किया। उन्होंने क्षेत्रीय पार्टी बनाने की संभावना को खारिज करते हुए कहा था कि उनके पास धनबल नहीं है। भाजपा और कांग्रेस—दोनों ने उन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश की।

सिद्धारमैया ने कहा कि वह भाजपा की विचारधारा से सहमत नहीं हैं और 2006 में अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए—एक ऐसा कदम जिसे कुछ साल पहले तक “अकल्पनीय” माना जा रहा था।

2004 में, तत्कालीन मुख्यमंत्री देवगौड़ा के प्रधानमंत्री बनने के बाद सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बनने से चूक गए थे। उस समय उन्हें जे एच पटेल ने पीछे छोड़ दिया, जिनकी कैबिनेट में वह उपमुख्यमंत्री रहे। देवगौड़ा और पटेल—दोनों के अधीन उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में भी काम किया।

एक जननेता के रूप में उभरे सिद्धारमैया ने अब तक 16 राज्य बजट पेश करने का रिकॉर्ड बनाया है।

‘जनता परिवार’ से निकले सिद्धारमैया डॉ. राम मनोहर लोहिया के समाजवादी विचारों से प्रभावित रहे। उन्होंने वकालत छोड़ राजनीति को अपनाया और अपने करियर की शुरुआत तालुक बोर्ड सदस्य के रूप में की।

1983 में मैसूरु की चामुंडेश्वरी सीट से लोकदल के टिकट पर विधानसभा में पदार्पण करने वाले सिद्धारमैया बाद में जनता पार्टी में शामिल हुए।

वह 1989 और 1999 के विधानसभा चुनाव तथा 1991 में कोप्पल लोकसभा सीट से चुनाव हार गए थे।

कांग्रेस में शामिल होने के बाद 2008 में वह केपीसीसी चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष बने। उस चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद वह नेता प्रतिपक्ष बने और भाजपा सरकार को भ्रष्टाचार, घोटालों और अवैध खनन के मुद्दों पर घेरा।

अपने प्रशासनिक कौशल के लिए पहचाने जाने वाले सिद्धारमैया ने 2013-18 के दौरान कांग्रेस सरकार का सफल पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। हालांकि ‘भाग्य’ योजनाओं के चलते लोकप्रिय होने के बावजूद कांग्रेस 2018 में सत्ता से बाहर हो गई।

2018 के चुनाव में सिद्धारमैया मैसूरु की चामुंडेश्वरी सीट से जद(एस) के जी टी देवगौड़ा से 36,042 वोटों से हार गए, लेकिन बागलकोट जिले की बादामी सीट से जीत दर्ज की।

2018 के बाद उन्होंने कांग्रेस-जद(एस) गठबंधन सरकार की समन्वय समिति के प्रमुख के रूप में काम किया। गठबंधन सरकार गिरने और भाजपा के सत्ता में आने के बाद वह नेता प्रतिपक्ष बने।

2023 के चुनाव को अपना आखिरी चुनाव बताते हुए सिद्धारमैया अपनी गृह सीट वरुणा लौटे और वहां से फिर जीत हासिल की। उन्होंने तब कहा था कि यह उनका आखिरी चुनाव हो सकता है, लेकिन वह आगे भी राजनीति में सक्रिय रहेंगे।

पीटीआई केएसयू एसए

श्रेणी: ब्रेकिंग न्यूज़

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