वन कानून में बदलाव निजी नियंत्रण की ओर झुकाव दर्शाते हैं: कांग्रेस

New Delhi: Congress leaders Salman Khurshid, Jairam Ramesh and others during the flag-hoisting ceremony marking the 140th Foundation Day of the party, at Indira Bhawan in New Delhi, Sunday, Dec. 28, 2025. (PTI Photo/Arun Sharma)(PTI12_28_2025_000047B)

नई दिल्ली, 7 जनवरी (पीटीआई) — कांग्रेस ने बुधवार को आरोप लगाया कि 2023 में वन (संरक्षण) अधिनियम में किए गए संशोधनों से वन प्रबंधन के निजीकरण का रास्ता खुल गया है।

कांग्रेस महासचिव और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 2 जनवरी को जारी एक परिपत्र (सर्कुलर) का स्क्रीनशॉट साझा किया, जो वन भूमि को पट्टे पर दिए जाने की शर्तों और दिशानिर्देशों में संशोधन से संबंधित है।

रमेश ने अपने पोस्ट में कहा, “अगस्त 2023 में मोदी सरकार ने संसद के जरिए वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 में संशोधन जबरन पारित कराए। इस कानून का नाम बदलकर वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 करने के अलावा, इन संशोधनों के जरिए देश में वन प्रशासन की कानूनी व्यवस्था में दूरगामी बदलाव किए गए।”

उन्होंने कहा कि उसी समय यह आशंका जताई गई थी कि इन संशोधनों से वन प्रबंधन के निजीकरण का रास्ता खुलेगा। “2 जनवरी 2026 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी परिपत्र से यह बात अब साफ हो गई है,” रमेश ने कहा।

उन्होंने दावा किया कि यह तो केवल शुरुआत है।

रमेश द्वारा साझा किए गए परिपत्र में कहा गया है कि सलाहकार समिति की सिफारिशों और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के आधार पर, केंद्र सरकार ने वन भूमि के पुनर्स्थापन और वनों से सतत कटाई के उपयोग से जुड़े विकसित होते ढांचे के अनुरूप तथा वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 की धारा 2(1)(i) और धारा 3C के प्रावधानों के तहत, 29 नवंबर 2023 को अधिसूचित दिशानिर्देशों में संशोधन किया है।

परिपत्र के अनुसार, यदि राज्य सरकारें सरकारी या गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ आपसी सहमति से सहायक प्राकृतिक पुनर्जनन (जिसमें वृक्षारोपण भी शामिल है) करने पर सहमत होती हैं और यह कार्य स्वीकृत वर्किंग प्लान या प्रबंधन योजना के तहत राज्य वन विभाग की निगरानी में किया जाता है, तो इसे वानिकी गतिविधि माना जाएगा।

इसके परिणामस्वरूप, ऐसी गतिविधियों पर प्रतिपूरक वनीकरण (कंपनसेटरी अफॉरेस्टेशन) और नेट प्रेज़ेंट वैल्यू (एनपीवी) के भुगतान की शर्तें लागू नहीं होंगी।

हालांकि, परिपत्र में यह भी कहा गया है कि राज्य सरकारें ऐसे वृक्षारोपण के उपयोग और उससे होने वाली आय के बंटवारे के लिए, प्रत्येक मामले के आधार पर, उपयुक्त ढांचा तय करने के लिए स्वतंत्र होंगी।

इसके अलावा, यह भी प्रावधान किया गया है कि वृक्षारोपण की अनुमति राज्य या केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) के आधार पर दी जाएगी, जिसमें क्षेत्रफल, प्रस्तावित प्रजातियां, गतिविधियां और सतत कटाई के

उपयोग जैसे विवरण शामिल होंगे।

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