
नई दिल्ली, 7 जनवरी (पीटीआई): दिल्ली हाईकोर्ट ने 2015 में अपनी नाबालिग पोती के यौन उत्पीड़न के मामले में 65 वर्षीय पुरुष को दी गई 10 साल की जेल की सजा को घटाकर पांच साल कर दिया है।
न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी ने कहा कि बच्चे पर फिंगरिंग और पैठ (penetration) करने के आरोपी पुरुष के खिलाफ आरोप “संदेह से परे प्रमाणित नहीं हुए हैं”, लेकिन नाबालिग ने “अपीलकर्ता द्वारा उसके निजी अंगों को छूने के आरोप में लगातार अपने बयान में संगति बनाए रखी है।”
कोर्ट ने आंशिक रूप से पुरुष की अपील को स्वीकार करते हुए उसे Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) एक्ट के तहत गंभीर पैठ यौन उत्पीड़न (aggravated penetrative sexual assault) से गंभीर यौन उत्पीड़न (aggravated sexual assault) के अपराध में दोषी ठहराया।
हाईकोर्ट ने 6 जनवरी को सुनाए गए अपने फैसले में कहा, “अपीलकर्ता की उम्र लगभग 65 वर्ष होने को ध्यान में रखते हुए, उसकी सजा को संशोधित कर 5 साल की कठोर कारावास कर दिया गया है, जो POCSO एक्ट की धारा 10 के तहत न्यूनतम अनिवार्य सजा है।”
प्रॉसिक्यूशन के अनुसार, 2015 में छह साल की बच्ची की दादी ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उसके पति ने उसकी पोती का यौन उत्पीड़न किया।
आरोपी ने दावा किया कि उसे झूठा फंसाया गया है, बच्चे के बयान में कई असंगतियां हैं और FIR दर्ज कराने में अनावश्यक देरी हुई।
हाईकोर्ट ने कहा कि फिंगरिंग और पैठ संबंधी आरोपों में विवरण की गंभीर कमी है और ये ज्यादातर गवाहों के मौखिक बयानों तक ही सीमित हैं। FIR में देरी और नाबालिग की मेडिकल जांच में देरी के कारण कोई फोरेंसिक सबूत उपलब्ध नहीं है।
जज ने कहा कि जबकि स्थापित कानून के अनुसार यौन उत्पीड़न के मामले में नाबालिग के एकल बयान पर भी दोषसिद्धि संभव है और कोर्ट को पुष्टि की आवश्यकता नहीं होती, ऐसे मामलों में संबंधित बयान उच्च गुणवत्ता का होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा, “वर्तमान मामले में यह मानदंड पूरा नहीं होता क्योंकि बच्चे के विभिन्न बयानों में कई असंगतियां हैं।”
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि नाबालिग पर फिंगरिंग और पैठ करने के आरोपी के खिलाफ आरोप संदेह से परे प्रमाणित नहीं हुए और इनमें पर्याप्त विवरण नहीं हैं।
श्रेणी: ब्रेकिंग न्यूज
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