नई दिल्ली, 8 जनवरी (पीटीआई) दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना उसकी शारीरिक स्वायत्तता (बॉडिली इंटीग्रिटी) का उल्लंघन है और इससे उसका मानसिक आघात और अधिक बढ़ता है। अदालत ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें एक पति ने अपनी अलग रह रही पत्नी के खिलाफ 14 सप्ताह के भ्रूण का चिकित्सकीय गर्भपात कराने को लेकर आपराधिक मामला दर्ज कराया था। अदालत ने पत्नी को इस मामले में आरोपों से मुक्त कर दिया।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने वैवाहिक मतभेद की स्थिति में महिला के गर्भपात के अधिकार पर जोर देते हुए कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता पत्नी को भारतीय दंड संहिता की धारा 312 (गर्भपात कराना) के तहत अपराधी नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि चुनाव की स्वतंत्रता व्यक्तिगत स्वायत्तता का एक महत्वपूर्ण पहलू है और प्रजनन पर नियंत्रण सभी महिलाओं की बुनियादी आवश्यकता और अधिकार है।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम के तहत गर्भपात के लिए महिला को पति की अनुमति लेने की कोई आवश्यकता नहीं है और इस कानून की “मूल भावना” महिला के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को होने वाली “गंभीर क्षति” को रोकना है।
अदालत ने अपने 6 जनवरी के फैसले में कहा, “यदि कोई महिला गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती, तो उसे ऐसा करने के लिए मजबूर करना उसकी शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन है और यह उसके मानसिक आघात को बढ़ाता है, जो उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।”
अदालत ने कहा कि जब सर्वोच्च न्यायालय अपने फैसलों में वैवाहिक मतभेद की स्थिति में महिला को गर्भपात का अधिकार दे चुका है और एमटीपी अधिनियम की धारा 3 तथा उसके तहत बने नियम भी यही कहते हैं, तो याचिकाकर्ता द्वारा आईपीसी की धारा 312 के तहत कोई अपराध किया गया, ऐसा नहीं कहा जा सकता।
याचिकाकर्ता महिला ने सत्र न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा उसे धारा 312 के तहत तलब किए जाने के फैसले को बरकरार रखा गया था।
महिला की ओर से दलील दी गई कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त उसकी प्रजनन स्वायत्तता को अपराध बना दिया गया और निजता, शारीरिक स्वायत्तता तथा निर्णय लेने की स्वतंत्रता जैसे उसके मौलिक अधिकारों की अनदेखी की गई।
वहीं, पति ने तर्क दिया कि गर्भपात के समय दंपति साथ रह रहे थे और उनके बीच कोई वैवाहिक मतभेद नहीं था, इसलिए एमटीपी अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होते।
हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि वैवाहिक मतभेद की परिभाषा को इतना संकीर्ण नहीं किया जा सकता कि वह केवल अलग रहने या कानूनी कार्यवाही शुरू होने के बाद ही मानी जाए।
अदालत ने कहा कि महिला के ओपीडी कार्ड में दर्ज कारण से स्पष्ट है कि वह पहले से ही विवाह के तनाव से गुजर रही थी और पति से अलग होने का निर्णय ले चुकी थी।
अदालत ने “इस पुरुषप्रधान दुनिया की कठोर सच्चाई” का उल्लेख करते हुए कहा कि आकस्मिक या अनचाही गर्भावस्था की स्थिति में पुरुष अक्सर जिम्मेदारी से पीछे हट जाता है और महिला को अकेले ही सब कुछ संभालना पड़ता है।
अदालत ने कहा, “पीड़ा केवल महिला को ही होती है। ऐसी गर्भावस्था असहनीय कठिनाइयों को जन्म देती है और गंभीर मानसिक आघात का कारण बनती है। गर्भावस्था के साथ सामाजिक, आर्थिक और अन्य कई पहलू जुड़े होते हैं और यदि गर्भ अनचाहा हो, तो इसके गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं। यह निस्संदेह महिला के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।”
अदालत ने आगे कहा कि एमटीपी नियम 3-बी(सी) के तहत यदि महिला की वैवाहिक स्थिति में परिवर्तन होता है, जैसे विधवापन या तलाक, तो वह गर्भपात की पात्र होती है। इस नियम का लाभ उन सभी महिलाओं को दिया जाना चाहिए, जिनकी परिस्थितियों में “महत्वपूर्ण बदलाव” आया हो।
न्यायालय ने कहा कि यह तथ्य कि महिला तनाव में थी और उसने वैवाहिक मतभेद महसूस किया, यह दर्शाता है कि ऐसी स्थिति उसके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती थी और इसलिए वह गर्भपात कराने के लिए सक्षम थी।
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