उच्च शिक्षा हासिल करने के अधिकार को हल्के में सीमित नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

Delhi High Court

नई दिल्ली, 12 जनवरी (पीटीआई) दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि उच्च या व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार भले ही संविधान के तहत मौलिक अधिकार न हो, लेकिन इसे हल्के में सीमित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती और इसे सुनिश्चित करना राज्य का एक सकारात्मक दायित्व है।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने उस छात्र के मामले में की, जिसकी मेडिकल कॉलेज में दाखिला नीट-यूजी 2024 में कथित अनियमितताओं में संलिप्तता के आरोपों के चलते रद्द कर दिया गया था।

सीबीआई के रुख को देखते हुए अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता इस मामले में आरोपी नहीं है, बल्कि एजेंसी द्वारा जांच किए जा रहे आपराधिक मामले में केवल एक गवाह है। इसलिए उसके द्वारा किसी भी प्रकार की कदाचार या अनुचित आचरण किए जाने का कोई प्रथम दृष्टया निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

अदालत ने कहा कि नीट-यूजी प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद याचिकाकर्ता को प्राप्त हुआ “मूल्यवान अधिकार” संरक्षित किया जाना चाहिए। कोर्ट के अनुसार, उसका दाखिला रद्द करना और एमबीबीएस पाठ्यक्रम से नाम हटाना “पूरी तरह से अनुचित आधारों” पर उसके शैक्षणिक भविष्य को बाधित करता है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने खुले और प्रतिस्पर्धी प्रवेश परीक्षा के जरिए मेरिट के आधार पर दाखिला हासिल किया था और इसे केवल वैध, वास्तविक और ठोस कारणों के आधार पर ही रद्द किया जा सकता है।

7 जनवरी को दिए गए फैसले में अदालत ने कहा, “उच्च या व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार भले ही भारत के संविधान के भाग-III में मौलिक अधिकार के रूप में स्पष्ट रूप से उल्लेखित न हो, लेकिन इसे सुनिश्चित करना राज्य का एक सकारात्मक दायित्व है और इसे हल्के में सीमित नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित पक्ष को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को पाठ्यक्रम के अनुसार एमबीबीएस की कक्षाएं जारी रखने की अनुमति दी जाए।

सीबीआई ने अदालत को बताया कि वह नीट-यूजी 2024 प्रश्नपत्र लीक से जुड़े आरोपों की जांच कर रही है। एजेंसी ने कहा कि उसने विभिन्न अनियमितताओं में कथित रूप से शामिल 22 उम्मीदवारों की पहचान की है, लेकिन याचिकाकर्ता आरोपपत्र में आरोपी नहीं है, बल्कि केवल एक गवाह है। पीटीआई एडीएस डीवी डीवी

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