सुप्रीम कोर्ट का विभाजित फैसला: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A पर, मामला बड़े बेंच के लिए CJI के समक्ष भेजा गया

New Delhi: A view of Supreme Court of India, in New Delhi, Tuesday, Dec. 16, 2025. (PTI Photo/Shahbaz Khan)(PTI12_16_2025_000044B)

नई दिल्ली, 13 जनवरी (पीटीआई) – सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के 2018 के प्रावधान की संवैधानिक वैधता पर विभाजित फैसला सुनाया। यह प्रावधान सरकारी कर्मियों के खिलाफ भ्रष्टाचार मामले में जांच शुरू करने से पहले पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य करता है।

न्यायमूर्ति बी.वी. नगरथना ने कहा कि धारा 17A असंवैधानिक है और इसे रद्द किया जाना चाहिए, जबकि न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने इसे संवैधानिक माना और ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा पर जोर दिया।

न्यायमूर्ति नगरथना ने कहा कि पूर्व मंजूरी की आवश्यकता भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के विपरीत है, जांच को रोकती है और भ्रष्ट लोगों की रक्षा करती है।

न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने कहा कि धारा 17A को रद्द करना “साथ में बच्चे को नहाने के पानी में फेंक देने” जैसा होगा और इसका उपाय बीमारी से भी बदतर होगा।

अब इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष रखा जाएगा ताकि अंतिम निर्णय के लिए बड़े बेंच का गठन किया जा सके।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A, जिसे जुलाई 2018 में पेश किया गया था, सार्वजनिक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वाह में किए गए किसी भी “सिफारिश, जांच या जाँच” को सक्षम प्राधिकरण की पूर्व मंजूरी के बिना रोकती है।

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला NGO ‘सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन’ (CPIL) द्वारा दायर याचिका पर आया, जिसमें संशोधित धारा 17A की वैधता पर सवाल उठाया गया था।

पीटीआई

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