
नई दिल्ली, 19 जनवरी (पीटीआई) मनरेगा (MGNREGA) की जगह लाए गए नए VB-G RAM G अधिनियम का विरोध करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने दावा किया है कि देश की ग्रामीण आबादी के लिए काम अब एक “रेवड़ी” बन जाएगा, जिसे सरकार अपनी मर्जी से देगी, और यह अब अधिकार नहीं रहेगा।
ग्रामीण जनता के नाम लिखे पत्र में कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि नए कानून के जरिए काम के अधिकार को “छीना” जा रहा है और राज्यों पर भी आर्थिक बोझ डाला जा रहा है।
खड़गे और गांधी का यह पत्र कांग्रेस के देशव्यापी “मनरेगा बचाओ संग्राम” अभियान का हिस्सा है, जिसमें पुराने कानून की बहाली की मांग की जा रही है। यह अभियान 10 जनवरी को शुरू हुआ और 25 फरवरी तक चलेगा।
कांग्रेस ने अपने सभी प्रदेश अध्यक्षों से कहा है कि इस पत्र का स्थानीय भाषाओं में अनुवाद कराकर ग्रामीण जनता तक पहुंचाया जाए।
पत्र में कहा गया है कि 20 साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) लागू कर काम के संवैधानिक अधिकार को जीवन दिया था।
इसके बाद से मनरेगा के तहत 180 करोड़ से अधिक मानव-दिवस का रोजगार सृजित हुआ, गांवों में तालाबों और सड़कों जैसी लगभग 10 करोड़ परिसंपत्तियां बनीं और ग्राम पंचायतों को गांव-स्तरीय परियोजनाओं पर निर्णय लेने का अधिकार देकर पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत किया गया।
पत्र में कहा गया, “कोविड-19 महामारी जैसे संकटों के दौरान मनरेगा ग्रामीण भारतीय अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा साबित हुआ। अब मोदी सरकार चार अहम तरीकों से मनरेगा की आत्मा को नष्ट करने की योजना बना रही है।
“आपका काम का अधिकार छीना जा रहा है। पहले: देश के हर ग्रामीण परिवार को कानूनी रूप से काम की गारंटी थी। किसी भी ग्राम पंचायत में काम मांगने पर 15 दिनों के भीतर काम देना अनिवार्य था।
अब: काम अब अधिकार नहीं रहेगा, बल्कि मोदी सरकार की मर्जी से बांटी जाने वाली ‘रेवड़ी’ बन जाएगा। सरकार तय करेगी कि किन ग्राम पंचायतों को योजना के तहत काम मिलेगा।”
पत्र में यह भी दावा किया गया कि मजदूरी का अधिकार भी छीना जा रहा है।
“पहले: अधिसूचित न्यूनतम मजदूरी पर काम मिलता था, जिसमें हर साल बढ़ोतरी होती थी और साल के 365 दिन काम उपलब्ध रहता था।
अब: मजदूरी मनमाने ढंग से तय की जाएगी, वार्षिक बढ़ोतरी की कोई गारंटी नहीं होगी। फसल कटाई के मौसम में योजना नहीं चलेगी, जिससे मजदूरों को बिना न्यूनतम मजदूरी के कोई भी काम स्वीकार करने को मजबूर होना पड़ेगा।”
कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि ग्राम पंचायतों के अधिकार ठेकेदारों को सौंपे जा रहे हैं। पहले ग्राम पंचायतें अपनी जरूरत के अनुसार विकास परियोजनाएं तय करती थीं, ठेकेदारों पर रोक थी और स्थानीय मनरेगा मेट्स व रोजगार सहायकों के जरिए काम होता था।
अब, उन्होंने कहा, परियोजनाओं के फैसले दिल्ली से “रिमोट कंट्रोल” के जरिए होंगे। ग्राम पंचायतें केवल केंद्र सरकार के आदेश लागू करने वाली एजेंसी बन जाएंगी, ठेकेदार लाए जाएंगे और मजदूर उनके अधीन साधारण श्रमिक बनकर रह जाएंगे। मनरेगा मेट्स और रोजगार सहायक भी नहीं रहेंगे।
राज्यों पर बढ़ते वित्तीय बोझ का जिक्र करते हुए पत्र में कहा गया कि पहले केंद्र सरकार 100 प्रतिशत मजदूरी देती थी और राज्यों को काम उपलब्ध कराने के लिए प्रोत्साहन मिलता था।
“अब राज्यों को मजदूरी का 40 प्रतिशत देना होगा। खर्च बचाने के लिए वे काम के दिनों को सीमित करने के लिए प्रेरित होंगे। इसका सबसे ज्यादा असर ग्रामीण परिवारों, खासकर महिलाओं और अनुसूचित जाति/जनजाति समुदायों पर पड़ेगा, जिनके लिए गारंटीड रोजगार भूख, कर्ज और मजबूरी में पलायन से बचने का सहारा है,” पत्र में कहा गया।
पत्र में कहा गया कि कांग्रेस पुराने कानून की बहाली के लिए “मनरेगा बचाओ संग्राम” का नेतृत्व कर रही है।
“हमारा लक्ष्य साफ है: गारंटीड काम, गारंटीड मजदूरी और गारंटीड जवाबदेही। हमारे स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता आपकी ग्राम पंचायत और ब्लॉक स्तर पर होने वाली गतिविधियों की जानकारी देंगे। न्याय की इस लड़ाई में हमारे साथ जुड़िए,” पत्र में कहा गया। पीटीआई एसकेसी आरसी
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