बॉन्डी गोलीबारी के बाद ऑस्ट्रेलियाई संसद ने हथियारों पर प्रतिबंध और घृणा-भाषण विरोधी कानून पारित किया

Australia’s Parliament

मेलबर्न, 21 जनवरी (एपी) ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ ने बुधवार को संसद द्वारा घृणा-भाषण विरोधी कानून और हथियारों से संबंधित नए नियम पारित किए जाने का स्वागत किया। ये कदम पिछले महीने सिडनी में एक यहूदी उत्सव के दौरान हुई गोलीबारी के बाद उठाए गए हैं, जिसमें दो हमलावरों ने 15 लोगों की हत्या कर दी थी। अधिकारियों के अनुसार, यह हमला इस्लामिक स्टेट समूह से प्रेरित था।

“बॉन्डी में आतंकियों के दिलों में नफरत थी, लेकिन उनके हाथों में बंदूकें थीं,” अल्बनीज़ ने संवाददाताओं से कहा। वे 14 दिसंबर को बॉन्डी बीच पर हनुक्का समारोह के दौरान यहूदी उपासकों पर हमला करने के आरोपी पिता-पुत्र बंदूकधारियों का जिक्र कर रहे थे।

उन्होंने कहा, “हमने कहा था कि हम इस मुद्दे से तात्कालिकता और एकता के साथ निपटना चाहते हैं, और हमने दोनों को सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई की।”

सरकार ने शुरुआत में एक ही विधेयक लाने की योजना बनाई थी, लेकिन बाद में घृणा-भाषण और हथियार कानूनों को अलग-अलग दो विधेयकों में बांट दिया, जिन्हें मंगलवार को प्रतिनिधि सभा में पेश किया गया।

ये विधेयक मंगलवार देर रात सीनेट से पारित हो गए। गन सुधारों को ग्रीन्स पार्टी का समर्थन मिला, जबकि रूढ़िवादी विपक्षी लिबरल पार्टी ने घृणा-भाषण विरोधी कानूनों का समर्थन किया।

अल्बनीज़ की केंद्र-वाम लेबर पार्टी के पास निचले सदन में बहुमत है, लेकिन उच्च सदन में किसी भी पार्टी को बहुमत हासिल नहीं है।

अल्बनीज़ ने कहा कि वे घृणा-भाषण के खिलाफ और कड़े कानून चाहते थे, लेकिन सीनेट में सहमति नहीं बन सकी।

उन्होंने कहा, “अगर नरसंहार के बाद भी कानून पारित नहीं हो सकते, तो लोगों का रुख बदलना मुश्किल है।”

नए हथियार कानून बंदूक रखने पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाते हैं और एक सरकारी वित्तपोषित ‘बायबैक’ कार्यक्रम शुरू करते हैं, जिसके तहत लोगों को अपनी बंदूकें जमा कराने के बदले मुआवजा दिया जाएगा।

घृणा-भाषण विरोधी कानूनों के तहत ऐसे समूहों को भी प्रतिबंधित किया जा सकेगा, जो ऑस्ट्रेलिया की आतंकवादी संगठनों की परिभाषा में नहीं आते, जैसे इस्लामवादी संगठन हिज़्ब उत-तहरीर, जिसे कुछ अन्य देशों में प्रतिबंधित किया गया है।

मंगलवार को गृह मामलों के मंत्री टोनी बर्क ने संसद को बताया कि कथित हमलावर साजिद अकरम (50) और उनके 24 वर्षीय बेटे नविद अकरम को प्रस्तावित कानूनों के तहत हथियार रखने की अनुमति नहीं मिलती।

हमले के दौरान पुलिस की गोली से मारे गए पिता ने हमले में इस्तेमाल की गई बंदूकें कानूनी रूप से रखी हुई थीं।

घायल बेटे पर 15 हत्या सहित दर्जनों आरोप लगाए गए हैं, साथ ही आतंकवादी कृत्य करने का भी एक आरोप है।

बर्क ने कहा कि भारतीय मूल के पिता को नए कानूनों के तहत बंदूक रखने से रोका जाता, क्योंकि वे ऑस्ट्रेलियाई नागरिक नहीं थे। ऑस्ट्रेलिया में जन्मे बेटे को भी प्रतिबंधित किया जाता, क्योंकि वह 2019 में संदिग्ध चरमपंथियों से संबंधों के चलते ऑस्ट्रेलियाई सुरक्षा खुफिया संगठन (एएसआईओ) की निगरानी में आ चुका था।

नए घृणा-भाषण कानूनों के तहत एएसआईओ की यह भी भूमिका होगी कि किन घृणा समूहों पर प्रतिबंध लगाया जाए। नव-नाजी संगठन ‘नेशनल सोशलिस्ट नेटवर्क’ ने कानूनों के तहत कार्रवाई से बचने के लिए खुद को भंग करने की घोषणा की है।

विपक्षी नेशनल्स पार्टी ने घृणा-भाषण कानून का विरोध करते हुए अपनी सहयोगी लिबरल पार्टी से अलग रुख अपनाया। पार्टी का कहना है कि यह कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर डाल सकता है।

नेशनल्स नेता डेविड लिटिलप्राउड ने मंगलवार देर रात कहा, “इस कानून में ऐसे संशोधन जरूरी हैं, जो अनपेक्षित परिणामों से बचाने और आम ऑस्ट्रेलियाइयों तथा यहूदी समुदाय के अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करें।”

संसद का सत्र आमतौर पर फरवरी में शुरू होना था, लेकिन 1996 के बाद ऑस्ट्रेलिया की सबसे भीषण सामूहिक गोलीबारी के मद्देनजर इसे पहले बुलाया गया।

1996 में तस्मानिया में एक अकेले हमलावर ने 35 लोगों की हत्या की थी, जिसके बाद देश में सख्त हथियार कानून लागू किए गए और लगभग 7 लाख बंदूकें सरकार ने वापस खरीदी थीं।

हालांकि, तस्मानिया, क्वींसलैंड और नॉर्दर्न टेरिटरी राज्य नए हथियार बायबैक कार्यक्रम को लेकर संघीय सरकार के दबाव का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इसकी लागत का आधा हिस्सा राज्यों और क्षेत्रों को वहन करना होगा।

बर्क ने कहा कि सरकार इस मुद्दे पर राज्यों और क्षेत्रों के साथ बातचीत जारी रखेगी। (एपी) जीएसपी

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