
संयुक्त राष्ट्र, 27 जनवरी (पीटीआई) चल रही भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच भारत ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला प्रभावी संगठन नहीं माना जा रहा है और अब चर्चाएं “समानांतर बहुपक्षीय (प्लूरिलैटरल) ढांचों” की ओर बढ़ गई हैं।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने सोमवार को यहां कहा, “सार्वभौमिक सदस्यता वाले बहुपक्षवाद, जिसके केंद्र में संयुक्त राष्ट्र है, पर दबाव बढ़ रहा है। इस संगठन के सामने मौजूद चुनौतियां केवल बजट तक सीमित नहीं हैं। संघर्षों से निपटने में जड़ता और प्रभावशीलता की कमी एक बड़ी कमजोरी बनी हुई है।”
‘अंतरराष्ट्रीय विधि के शासन की पुनः पुष्टि: शांति, न्याय और बहुपक्षवाद को पुनर्जीवित करने के मार्ग’ विषय पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की खुली बहस को संबोधित करते हुए हरीश ने कहा कि दुनिया भर के लोग संयुक्त राष्ट्र को ऐसा संगठन नहीं मानते जो अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करता हो।
उन्होंने कहा, “बातचीत और चर्चाएं अब समानांतर बहुपक्षीय ढांचों की ओर बढ़ गई हैं, जिनमें कुछ मामलों में निजी क्षेत्र के पक्षकार भी शामिल हैं, ताकि संयुक्त राष्ट्र ढांचे के बाहर शांति और सुरक्षा से जुड़े परिणाम हासिल किए जा सकें।”
भारत का यह बयान ऐसे समय आया है, जब संयुक्त राष्ट्र और उसकी सबसे शक्तिशाली संस्था—सुरक्षा परिषद—वैश्विक भू-राजनीतिक संघर्षों को रोकने और सुलझाने तथा अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने में लगातार विफल रही है।
इसी बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाज़ा को लेकर अपना ‘बोर्ड ऑफ पीस’ शुरू किया है, जिसे संयुक्त राष्ट्र के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जा रहा है।
ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई वैश्विक नेताओं को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है, जो गाज़ा में स्थायी शांति लाने और “वैश्विक संघर्ष” के समाधान के लिए “नए साहसिक दृष्टिकोण” पर काम करेगा।
पिछले सप्ताह दावोस में विश्व आर्थिक मंच के इतर आयोजित एक समारोह में ट्रंप ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के चार्टर को औपचारिक रूप से अनुमोदित किया, जिससे इसे एक आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में स्थापित किया गया।
ट्रंप इस बोर्ड के अध्यक्ष होंगे। जिन देशों ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के चार्टर पर हस्ताक्षर कर इसमें शामिल हुए हैं, उनमें अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अज़रबैजान, बहरीन, बुल्गारिया, हंगरी, इंडोनेशिया, जॉर्डन, कज़ाखस्तान, कोसोवो, मंगोलिया, मोरक्को, पाकिस्तान, पैराग्वे, क़तर, सऊदी अरब, तुर्किये, यूएई और उज़्बेकिस्तान शामिल हैं।
हरीश ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय विधि के शासन के अनुप्रयोग में निरंतरता, निष्पक्षता और पूर्वानुमेयता होनी चाहिए तथा इसमें दोहरे मानदंड नहीं होने चाहिए।
भारत ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय विधि के शासन का उपयोग राज्य की संप्रभुता पर सवाल उठाने और राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के लिए हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, “औपनिवेशिक दौर के वे अंतरराष्ट्रीय विधि सिद्धांत, जिन्होंने आत्मनिर्णय और उपनिवेशवाद से मुक्त होकर नए सदस्य देशों के उदय में मदद की, उन्हें राज्यों की एकता और क्षेत्रीय अखंडता पर हमला करने के लिए हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।”
हरीश ने कहा, “परिस्थितियां और संदर्भ लगातार बदलते रहते हैं। यदि बहुपक्षवाद परिणामों और समाधानों को अपरिवर्तनीय और जड़ मानकर व्यावहारिक रूप से बदलाव के अनुरूप ढलने में असमर्थ रहता है, तो यह वैकल्पिक सहभागिता प्रारूपों के उभरने को बढ़ावा देगा।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत अपने राष्ट्रीय शासन में विधि के शासन को एक मूल स्तंभ के रूप में मानता है, जो उसके संविधान में निहित है और न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा न्याय तक पहुंच बढ़ाने वाली पहलों के माध्यम से मजबूत हुआ है।
हरीश ने कहा, “राष्ट्रीय स्तर पर भारत में विधि के शासन की ये गहरी जड़ें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विधि के शासन के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दिशा और मार्गदर्शन देती हैं।”
सुरक्षा परिषद में भारत ने कहा कि प्रवर्तनीयता के बिना विधि का शासन “बंजर” है। हरीश ने कहा, “ध्यान प्राचीन और जटिल अवधारणाओं से हटकर ऐसे व्यावहारिक समाधानों और परिणामों पर होना चाहिए, जो हमारे नागरिकों के दैनिक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालें।”
उन्होंने कहा कि दुनिया विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से बदल और रूपांतरित हो रही है। अंतरराष्ट्रीय विधि के शासन को नियंत्रित करने वाला कानूनी और संस्थागत ढांचा भी इस तेजी से बदलते परिदृश्य के अनुरूप होना चाहिए। “अप्रासंगिकता से बचने के लिए निरंतर समीक्षा, अद्यतन और पुनर्जीवन अनिवार्य है,” उन्होंने कहा।
बहुपक्षवाद और अंतरराष्ट्रीय विधि के शासन को प्रभावी और विश्वसनीय बनाए रखने पर जोर देते हुए भारत ने कहा कि वैश्विक शासन संरचनाओं को समकालीन वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने के लिए विकसित होना होगा।
उन्होंने कहा, “संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा संरचना, विशेष रूप से सुरक्षा परिषद की संरचना, बीते युग की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को दर्शाती है। पिछले आठ दशकों में शक्ति संतुलन, जनसांख्यिकी और वैश्विक चुनौतियों की प्रकृति में आए व्यापक बदलावों के मद्देनजर स्थायी और अस्थायी—दोनों श्रेणियों में विस्तार सहित व्यापक सुधार की तत्काल और मजबूत आवश्यकता है।”
उन्होंने आगे कहा कि ऐसे सुधार सुरक्षा परिषद की वैधता बढ़ाने और वर्तमान चुनौतियों से निपटने में उसकी प्रासंगिकता और प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं।
इसके अलावा, भारत ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख अंगों के बीच तालमेल की पहचान और उसे मजबूत करना विधि के शासन को आगे बढ़ाने में सहायक होगा।
उन्होंने कहा, “इससे जनादेशों के बीच बेहतर समन्वय संभव होगा, दोहराव से बचा जा सकेगा और प्रभाव में वृद्धि होगी। प्रक्रिया-आधारित सुधार इन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए अहम हैं। पूर्वानुमेय और पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराना, क्षमता निर्माण और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तकनीकी सहायता इन सुधारों के प्रमुख तत्व हैं।”
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