भू-राजनीतिक दरारें गहराने के बीच भारत-ईयू नेता संयुक्त रणनीति तय करेंगे

**EDS: THIRD PARTY IMAGE** In this image posted on Jan. 25, 2026, Union Minister of State for Commerce & Industry and Electronics & Information Technology Jitin Prasada receives European Council President Antonio Costa upon his arrival for a state visit to India, in New Delhi. European Commission President Ursula von der Leyen is also seen. (@JitinPrasada/X via PTI Photo)(PTI01_25_2026_000343B)

नई दिल्ली, 27 जनवरी (पीटीआई) भू-राजनीतिक उथल-पुथल और व्यापारिक व्यवधानों के बीच भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के शीर्ष नेता मंगलवार को एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते पर बातचीत पूरी होने की घोषणा करेंगे, एक रणनीतिक रक्षा समझौते को अंतिम रूप देंगे और आगे की राह के लिए व्यापक दृष्टि प्रस्तुत करेंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा की मेजबानी करेंगे। यह शिखर वार्ता यूरोप और अमेरिका के बीच संबंधों में उभरती नई दरारों की पृष्ठभूमि में हो रही है।

कोस्टा और वॉन डेर लेयेन सोमवार को कर्तव्य पथ पर 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे।

शिखर सम्मेलन से पहले वॉन डेर लेयेन ने कहा, “एक सफल भारत दुनिया को अधिक स्थिर, समृद्ध और सुरक्षित बनाता है। और इससे हम सभी को लाभ होता है।”

दुनिया हाल के समय में व्यापार और सुरक्षा को लेकर वॉशिंगटन की नीतियों के कारण नए भू-राजनीतिक झटकों की साक्षी रही है।

लंबे समय से प्रतीक्षित भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए), जिसे “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है, द्विपक्षीय संबंधों की समग्र दिशा को उल्लेखनीय रूप से विस्तार देने की उम्मीद है, क्योंकि इससे विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के नए अवसर खुलेंगे।

शिखर वार्ता के बाद दोनों पक्ष एफटीए पर बातचीत पूरी होने की घोषणा करेंगे। हालांकि, समझौते पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर होने में कम से कम छह महीने लग सकते हैं, क्योंकि दोनों पक्षों द्वारा कानूनी जांच (लीगल स्क्रबिंग) की आवश्यकता होगी।

भारत और ईयू ने पहली बार 2007 में एफटीए वार्ता शुरू की थी, लेकिन महत्वाकांक्षा में अंतर के कारण 2013 में इसे निलंबित कर दिया गया था। जून 2022 में वार्ता दोबारा शुरू हुई।

ईयू, एक ब्लॉक के रूप में, वस्तुओं के व्यापार में भारत का सबसे बड़ा भागीदार है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत-ईयू के बीच कुल वस्तु व्यापार लगभग 136 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जिसमें निर्यात करीब 76 अरब डॉलर और आयात लगभग 60 अरब डॉलर का था।

अधिकारियों के अनुसार, शिखर सम्मेलन का व्यापक फोकस व्यापार, रक्षा और सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था को मजबूत करने पर होगा।

मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के अलावा, दोनों पक्ष एक रक्षा ढांचा समझौता और एक रणनीतिक एजेंडा भी पेश करेंगे।

भारत और यूरोपीय संघ 2004 से रणनीतिक साझेदार हैं।

प्रस्तावित सुरक्षा और रक्षा साझेदारी (एसडीपी) दोनों पक्षों के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग को गहरा करेगी। अधिकारियों ने कहा कि एसडीपी से रक्षा क्षेत्र में इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ेगी और भारतीय कंपनियों के लिए ईयू के SAFE (सिक्योरिटी एक्शन फॉर यूरोप) कार्यक्रम में भागीदारी के अवसर खुलेंगे।

SAFE ईयू का 150 अरब यूरो का वित्तीय साधन है, जिसका उद्देश्य सदस्य देशों को रक्षा तैयारियों में तेजी लाने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करना है।

शिखर सम्मेलन में भारत और ईयू ‘सिक्योरिटी ऑफ इन्फॉर्मेशन एग्रीमेंट’ (एसओआईए) पर बातचीत शुरू करने की भी घोषणा करेंगे। इस समझौते से औद्योगिक रक्षा सहयोग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

दोनों पक्ष भारतीय श्रमिकों की यूरोप में आवाजाही को सुगम बनाने के लिए एक समझौते पर भी हस्ताक्षर करेंगे। अधिकारियों ने कहा कि इससे ईयू सदस्य देशों द्वारा भारत के साथ गतिशीलता पहलों को आगे बढ़ाने का ढांचा मिलेगा।

फ्रांस, जर्मनी और इटली उन यूरोपीय देशों में शामिल हैं जिनके भारत के साथ प्रवासन और गतिशीलता साझेदारी समझौते हैं।

दोनों पक्ष अन्य कई क्षेत्रों में गहरे सहयोग के लिए भी अनेक समझौतों पर हस्ताक्षर करने की संभावना है।

वे रूस-यूक्रेन युद्ध सहित प्रमुख वैश्विक चुनौतियों पर भी चर्चा करेंगे।

हालांकि दोनों पक्ष हर मुद्दे पर सहमत नहीं हैं, लेकिन स्थिर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाए रखने जैसे कुछ मूल हित वे साझा करते हैं, यूरोपीय अधिकारियों ने पिछले सप्ताह कहा था।

यह शिखर सम्मेलन भारत के साथ “यूक्रेन के खिलाफ रूस के आक्रामक युद्ध” पर चर्चा का भी अवसर होगा।

अधिकारियों के अनुसार, राष्ट्रपति कोस्टा यह संदेश दोहराएंगे कि यह युद्ध यूरोप के लिए अस्तित्वगत खतरा है, नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए सीधी चुनौती है और इसके इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर भी स्पष्ट प्रभाव हैं।

पिछले कुछ वर्षों में भारत और ईयू के संबंधों में उल्लेखनीय मजबूती आई है।

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