बेतुल (दक्षिण गोवा), 27 जनवरी (पीटीआई): भारत को सतत आर्थिक विकास और अपने नेट-जीरो लक्ष्यों के बीच की खाई पाटने के लिए ऊर्जा क्षेत्र में औसतन हर साल करीब 145 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश करना होगा। वुड मैकेंज़ी ने मंगलवार को यह बात कही और बताया कि 2035 तक लगभग 6 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि बनाए रखने के साथ-साथ ऊर्जा संक्रमण को आगे बढ़ाने के लिए यह निवेश बेहद अहम होगा।
इंडिया एनर्जी वीक 2026 में बोलते हुए वुड मैकेंज़ी के एशिया पैसिफिक उपाध्यक्ष जोशुआ एनगू ने कहा कि पूंजी निवेश को रणनीतिक रूप से बिजली उत्पादन, ऊर्जा भंडारण और ग्रिड के त्वरित आधुनिकीकरण पर केंद्रित करना होगा, ताकि भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और डीकार्बनाइजेशन लक्ष्यों को समर्थन मिल सके।
एनगू ने कहा, “भारत के लिए अगला दशक निर्णायक है। चुनौती दोहरी है—एक ओर तत्काल ऊर्जा सुरक्षा के जोखिम को कम करना और दूसरी ओर कम-कार्बन ढांचे का निर्माण करना, जो एक शीर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था को सहारा दे सके। आज किए गए निवेश यह तय करेंगे कि भारत कार्बन-गहन अवसंरचना में फंसा रहेगा या कम-कार्बन औद्योगिकीकरण में वैश्विक नेतृत्व करेगा।”
वुड मैकेंज़ी के अनुसार, बिजली क्षेत्र भारत में उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत होने के बावजूद ऊर्जा संक्रमण का प्रमुख इंजन भी है। इस क्षेत्र में संरचनात्मक बदलाव आ चुका है, जहां गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित क्षमता अब जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता से अधिक हो गई है।
आगे चलकर संक्रमण का आधार नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार, ग्रिड की लचीलापन क्षमता और भंडारण होगा, जबकि कोयला आधारित क्षमता का विस्तार मुख्य रूप से विश्वसनीयता और पीक मांग संतुलन तक सीमित रहेगा, न कि ऊर्जा वृद्धि के लिए।
हालांकि, डीकार्बनाइजेशन की तेज़ रफ्तार से सिस्टम एकीकरण की चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। वुड मैकेंज़ी का अनुमान है कि 2026 से 2035 के बीच ऊर्जा संक्रमण के लिए कुल 1.5 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की जरूरत होगी, जिसमें बड़ा हिस्सा ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन अवसंरचना पर खर्च होगा।
वुड मैकेंज़ी की पावर और रिन्यूएबल्स रिसर्च की उपाध्यक्ष राशिका गुप्ता ने कहा, “2026 से 2035 के बीच ऊर्जा संक्रमण के लिए 1.5 ट्रिलियन डॉलर का निवेश केवल मेगावाट जोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रिड और तारों से जुड़ा मामला है। सफलता बाजार सुधारों की गति पर निर्भर करेगी, विशेष रूप से बिजली संशोधन विधेयक पर, जो वितरण में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और ग्रिड आधुनिकीकरण के लिए निजी पूंजी आकर्षित करने हेतु पारदर्शी निवेश संकेत देगा।”
रिपोर्ट में कहा गया है कि नवीकरणीय ऊर्जा के तेज विस्तार के बावजूद, निकट भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा के लिए हाइड्रोकार्बन ईंधन अहम बने रहेंगे। भारत 2030 तक 1.5 अरब टन कोयला उत्पादन लक्ष्य हासिल करने की राह पर है, साथ ही ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाने के लिए कोयला गैसीकरण पर भी जोर दिया जा रहा है।
इसके साथ ही कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता बढ़ने की संभावना है, जो 2035 तक 87 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। एनगू ने कहा, “इस जोखिम को कम करने के लिए भारत को अपने अपस्ट्रीम सेक्टर को पुनर्जीवित करना होगा। अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनियों को भारतीय अन्वेषण और उत्पादन क्षेत्र में वापस लाना अब विकल्प नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा की अनिवार्यता है।”
प्राकृतिक गैस भारत के लिए चुनौती और अवसर दोनों है। देश की गैस मांग 2024 में 72 अरब घन मीटर से बढ़कर 2050 तक 140 अरब घन मीटर से अधिक होने का अनुमान है, जिसका बड़ा हिस्सा औद्योगिक खपत से आएगा। उद्योग क्षेत्र 2030 तक गैस मांग का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा बनाए रखेगा और 2050 तक भी यह 55 प्रतिशत से ऊपर रहेगा।
वुड मैकेंज़ी के अनुसार, भारत का एलएनजी आयात 2050 तक 4.8 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़कर 90 मिलियन टन प्रति वर्ष तक पहुंच सकता है। हालांकि, गैस की ओर संक्रमण ईंधन की कीमतों की प्रतिस्पर्धात्मकता पर निर्भर करेगा।
रिपोर्ट में कहा गया कि कम-कार्बन आपूर्ति श्रृंखलाओं का स्वदेशीकरण आयात निर्भरता कम करने की भारत की रणनीति का अहम हिस्सा है। भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोलर मॉड्यूल निर्माता है, लेकिन सेल और वेफर जैसे क्षेत्रों में वर्टिकल इंटीग्रेशन की कमी बनी हुई है।
जून 2026 से सोलर सेल के लिए घरेलू सामग्री अनिवार्यता लागू होने से अल्पकालिक आपूर्ति दबाव बनने की आशंका है, जब तक कि साल के अंत तक अनुमानित 24 गीगावॉट नई क्षमता चालू नहीं हो जाती।
बैटरी क्षेत्र में चुनौतियां और भी गंभीर हैं। घोषित 200 गीगावॉट-घंटा से अधिक क्षमता योजनाओं के बावजूद, वुड मैकेंज़ी का अनुमान है कि 2030 तक केवल लगभग 100 गीगावॉट-घंटा क्षमता ही परिचालन में आ पाएगी। इसका कारण कार्यान्वयन जोखिम और एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) बैटरी पीएलआई योजना की खामियां बताई गई हैं, जिनमें बड़े सुधार की जरूरत है।
2030 तक 50 लाख टन प्रतिवर्ष ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का भारत का लक्ष्य भी महत्वाकांक्षा और क्रियान्वयन के बीच बढ़ते अंतर का सामना कर रहा है, क्योंकि अधिकांश परियोजनाएं अभी शुरुआती व्यवहार्यता चरण में हैं। कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) भी अभी शुरुआती दौर में है, जहां प्रयास मुख्य रूप से नीति निर्माण तक सीमित हैं।
वुड मैकेंज़ी की एशिया पैसिफिक सीसीयूएस प्रमुख हेतल गांधी ने कहा, “2026 में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम की शुरुआत भारत की जलवायु नीति में एक निर्णायक बदलाव है। उत्सर्जन सीमाएं तय करके यह ढांचा औद्योगिक वृद्धि को उत्सर्जन तीव्रता से अलग करने के लिए प्रोत्साहित करेगा।”
रिपोर्ट में कहा गया कि निकट अवधि की चुनौतियों के बावजूद, भारत वैश्विक सोलर और बैटरी आपूर्ति श्रृंखलाओं में चीन के एक बड़े विकल्प के रूप में उभरने की मजबूत स्थिति में है।
एनगू ने कहा, “भारत एक चौराहे पर खड़ा है, लेकिन इसका दीर्घकालिक भविष्य उज्ज्वल है। घरेलू विनिर्माण को बढ़ाकर और नीतिगत गति बनाए रखकर भारत न केवल 500 गीगावॉट का लक्ष्य हासिल करेगा, बल्कि वैश्विक नवीकरणीय बाजार का एक केंद्रीय स्तंभ भी बनेगा।”
श्रेणी: ब्रेकिंग न्यूज़
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