भारत-ईयू एफटीए से लाभ अपने आप नहीं मिलेगा, दक्षता बढ़ाना जरूरी: अभिजीत बनर्जी

Kolkata: Nobel laureate Abhijit Vinayak Banerjee releases the book The Government Houses and Estates of Bengal with Malabika Banerjee, Director, Exide Kolkata Literary Meet, Jayanta Sengupta, Director, Alipore Museum, and Gyanesh Chaudhury, Chairman and Managing Director, Vikram Solar Pvt Ltd, during the Exide Kolkata Literary Meet at Alipore Museum, in Kolkata, Tuesday, Jan. 27, 2026. (PTI Photo)(PTI01_27_2026_000459B)

कोलकाता, 29 जनवरी (पीटीआई): नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने कहा है कि भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) मुक्त व्यापार समझौता एक “रणनीतिक गठजोड़” है, जो अमेरिका को यह संकेत देता है कि भारत और यूरोप अमेरिका पर उतना निर्भर नहीं हैं जितना वह मानता है। उन्होंने यह टिप्पणी डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए ऊंचे टैरिफ के संदर्भ में की। हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि इस बहुप्रचारित समझौते से व्यापक लाभ तभी मिलेंगे, जब भारत अपनी दक्षता और लॉजिस्टिक्स में बड़े पैमाने पर सुधार करेगा।

पीटीआई को दिए एक साक्षात्कार में बनर्जी ने कहा कि इस समझौते को अक्सर “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है, लेकिन यह अपने आप आर्थिक फायदे सुनिश्चित नहीं करता। उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ व्यापार संबंधों को लेकर भारत अब तक यह पूरी तरह नहीं समझ पाया है कि ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की असली आपत्ति क्या है। उनके मुताबिक, अमेरिका ने बार-बार समझौते के दावे किए, लेकिन वास्तव में भारत के साथ सौदेबाजी में उसने सीमित रुचि दिखाई।

बनर्जी ने कहा कि यह समझौता निश्चित रूप से एक रणनीतिक संदेश देता है कि भारत और यूरोप, दोनों मिलकर अमेरिका को यह दिखा सकते हैं कि वे उसके बिना भी विकल्प तलाश सकते हैं। हालांकि, उन्होंने इस बात पर संदेह जताया कि इससे वास्तव में कितनी सौदेबाजी की ताकत पैदा होगी।

हाल ही में संपन्न भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि व्यापार समझौते केवल शुरुआत होते हैं। असली चुनौती यह है कि देश के पास बेचने के लिए प्रतिस्पर्धी उत्पाद हों और बाजार उन्हें स्वीकार करने को तैयार हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज की प्रतिस्पर्धा केवल टैरिफ तक सीमित नहीं है।

सरकारी अधिकारियों के अनुसार, यह समझौता लगभग वैश्विक जीडीपी के एक-चौथाई हिस्से को कवर करेगा। इसके तहत भारत के 99 प्रतिशत निर्यात पर ईयू में टैरिफ घटाए जाएंगे, जबकि भारत में ईयू के 97 प्रतिशत से अधिक निर्यात पर शुल्क कम होगा। इससे भारत के वस्त्र, परिधान, चमड़ा, हस्तशिल्प, जूते और समुद्री उत्पाद जैसे क्षेत्रों को लाभ मिलने की उम्मीद है, वहीं यूरोप को वाइन, ऑटोमोबाइल, रसायन और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में फायदा होगा।

बनर्जी ने कहा कि भारत आभूषण, चमड़ा और वस्त्र जैसे क्षेत्रों पर जोर दे रहा है, लेकिन इन क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा अलग-अलग है। उन्होंने बताया कि आभूषण और चमड़े में भारत मजबूत है, जबकि वस्त्रों में यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस तरह के वस्त्र की बात हो रही है। उन्होंने यह भी कहा कि वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देश भी प्रतिस्पर्धी हैं और कई मामलों में भारत से आगे हैं।

उनके अनुसार असली समस्या आपूर्ति श्रृंखला और डिलीवरी की गति में है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी खुदरा विक्रेताओं से बातचीत में यह बात सामने आती है कि भारतीय आपूर्ति धीमी है। परिवहन प्रणाली और बंदरगाहों की धीमी कार्यप्रणाली भी बड़ी बाधा है। उन्होंने चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां के आपूर्तिकर्ता बेहद तेजी से डिलीवरी करते हैं, जिससे वे कीमत के अलावा भी बढ़त हासिल कर लेते हैं।

2024-25 वित्त वर्ष में भारत और ईयू के बीच वस्तुओं का कुल व्यापार लगभग 136 अरब डॉलर रहा, जिसमें भारत का निर्यात करीब 76 अरब डॉलर और आयात 60 अरब डॉलर था। बनर्जी ने कहा कि यदि एक देश समान कीमत पर तेज डिलीवरी दे सकता है, तो खरीदार उसी को चुनेंगे। इसलिए भारत को चीनी स्तर की दक्षता हासिल करनी होगी, तभी ऐसे व्यापार समझौतों से वास्तविक लाभ मिल पाएगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका द्वारा लगाए गए ऊंचे टैरिफ ने वैश्विक व्यापार को बाधित किया है और भारत को भी 50 प्रतिशत तक के टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें रूसी तेल खरीद से जुड़े 25 प्रतिशत शुल्क शामिल हैं। भारत ने इन कदमों को अनुचित और अव्यावहारिक बताया है और कहा है कि उसकी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हितों पर आधारित है।

बनर्जी ने यह भी कहा कि भारत यह पूरी तरह नहीं समझ पाया है कि ट्रंप प्रशासन भारत के प्रति इतना नकारात्मक क्यों रहा। उन्होंने कहा कि अमेरिका अक्सर बातचीत के दावे करता है, लेकिन बाद में उन्हें नकार दिया जाता है, जिससे स्थिति और जटिल हो जाती है।

उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या भारत यूरोप के जरिए अमेरिकी बाजार की भरपाई कर सकता है। उनके अनुसार, भारत भले ही बड़ा बाजार हो, लेकिन अमेरिका की तुलना नहीं की जा सकती। यूरोप की ताकत लग्जरी वस्तुओं और मशीनरी में है, जबकि अमेरिका का बाजार आकार में कहीं अधिक विशाल है।

अंत में, उन्होंने कहा कि भारत-ईयू एफटीए से भारत को कितना लाभ मिलेगा, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत इसका कितना सही इस्तेमाल कर पाता है। टैरिफ कीमत का केवल एक हिस्सा हैं, जबकि आपूर्ति की विश्वसनीयता, परिवहन की दक्षता और समय पर डिलीवरी जैसे कारक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए यह मान लेना गलत होगा कि इस समझौते से लाभ अपने आप मिल जाएगा।

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