
कोलकाता, 1 फरवरी (पीटीआई) पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रधान मुख्य सलाहकार और राज्य वित्त विभाग के प्रमुख अमित मित्रा ने रविवार को केंद्रीय बजट को “गरीब-विरोधी, किसान-विरोधी और मध्यम वर्ग-विरोधी” करार देते हुए 2015-16 की तुलना में सामाजिक क्षेत्रों के लिए आवंटन में की गई भारी कटौती की आलोचना की।
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए मित्रा ने कहा कि किसानों, युवाओं और कमजोर वर्गों को प्रभावित करने वाले प्रमुख क्षेत्रों में वर्षों से लगातार कटौती की गई है, जबकि बड़े-बड़े आवंटन जमीन पर वास्तविक खर्च में तब्दील नहीं हो पाए हैं।
शिक्षा का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि आदर्श रूप से कुल व्यय का 5-6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च होना चाहिए था, लेकिन वास्तविकता में यह 2015-16 के 3.8 प्रतिशत से घटकर मौजूदा बजट अनुमान में 2.60 प्रतिशत रह गया है।
उन्होंने आरोप लगाया, “जब दुनिया शिक्षा पर खर्च बढ़ा रही है, तब भारत इसे घटा रहा है। शिक्षा पर खर्च 5-6 प्रतिशत के करीब होना चाहिए, लेकिन यह बजट इसके उलट दिशा में जा रहा है।”
उर्वरक सब्सिडी को लेकर मित्रा ने कहा कि इसका आवंटन 2015-16 में कुल व्यय के 4.04 प्रतिशत से घटकर मौजूदा बजट अनुमान में 3.19 प्रतिशत रह गया है।
उन्होंने कहा, “यह एक गंभीर कटौती है और यह किसान-विरोधी है।”
उन्होंने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी और अल्पसंख्यकों जैसे समाज के कमजोर वर्गों के लिए आवंटन में कमी की ओर भी ध्यान दिलाया और कहा कि इन पर खर्च 2015-16 में कुल बजट का 0.21 प्रतिशत था, जो घटकर 0.19 प्रतिशत हो गया है और आगे और गिरने का अनुमान है।
“यह कमजोर वर्गों की उपेक्षा को दर्शाता है,” मित्रा ने कहा।
बजट आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए उन्होंने प्रमुख योजनाओं में बजट अनुमान, संशोधित अनुमान और वास्तविक खर्च के बीच बड़े अंतर की ओर इशारा किया।
प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि 2024-25 में लगभग 30,170 करोड़ रुपये का बजट अनुमान था, जिसे घटाकर 13,670 करोड़ रुपये कर दिया गया, जबकि वास्तविक खर्च सिर्फ 5,815 करोड़ रुपये रहा। उन्होंने कहा कि पीएमएवाई (ग्रामीण) और स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) में भी इसी तरह का रुझान देखा गया।
उन्होंने कहा, “ये उदाहरण दिखाते हैं कि बजट अनुमान भरोसेमंद नहीं हैं। जब वास्तविक आंकड़े सामने आते हैं, तब तक आवंटन ढह जाते हैं।”
मित्रा ने यह भी आरोप लगाया कि बजट पूंजी निकासी और बेरोजगारी की समस्या को दूर करने में विफल रहा है। उन्होंने विदेशी निवेश की भारी निकासी और खासकर युवाओं में लगातार ऊंची बेरोजगारी का हवाला दिया।
उन्होंने कहा, “बजट को विकासोन्मुख और रोजगार-प्रेरित बताया गया, लेकिन जब शिक्षा, कृषि, आवास और कल्याण पर कटौती की जाती है, तो एक बुनियादी सवाल उठता है— यह बजट आखिर किसके लिए है?”
डानकुनी से सूरत तक नए फ्रेट कॉरिडोर की घोषणा पर सवाल उठाते हुए मित्रा ने इसके क्रियान्वयन को लेकर संदेह जताया।
उन्होंने कहा कि मौजूदा फ्रेट कॉरिडोर पिछले दस वर्षों से अधूरे पड़े हैं और डानकुनी से वाराणसी तक घोषित परियोजना बिहार सीमा पर अटकी हुई है।
इसके विपरीत, उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार पहले से ही कॉरिडोर परियोजनाओं पर काम कर रही है, जिनमें तीन खंडों पर निर्माण जारी है और तीन अन्य की योजना बनाई जा रही है।
पाप वस्तुओं (सिन गुड्स) पर बढ़े कर को लेकर पूछे गए सवाल पर मित्रा ने कहा कि केंद्र कर के नाम पर सेस लगाकर राज्यों से पैसा छीन रहा है।
उन्होंने निगरानी के लिए आंकड़ों की पर्याप्तता पर आईएमएफ की एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया और कहा कि भारत को अब ‘सी’ ग्रेड दिया गया है।
अंत में उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल अपना अलग बजट पेश करेगा, जिसमें यह दिखाया जाएगा कि राज्य सरकार इन चुनौतियों से कैसे निपट रही है। (पीटीआई) BSM MNB
