मनरेगा एक परिवर्तनकारी कानून था, उसका विकल्प एक खामी है: कांग्रेस

New Delhi: Congress MP Jairam Ramesh during the all-party meeting ahead of the Budget session of Parliament, in New Delhi, Tuesday, Jan. 27, 2026. (PTI Photo/Money Sharma)(PTI01_27_2026_000061B)

नई दिल्ली, 2 फरवरी (पीटीआई)

मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए कांग्रेस ने सोमवार को कहा कि मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) एक परिवर्तनकारी कानून था, जबकि केंद्र द्वारा लाई गई नई योजना, जिसने इसे “खत्म कर दिया”, एक खामी है।

कांग्रेस के महासचिव (संचार प्रभारी) जयराम रमेश ने कहा कि आज से ठीक 20 साल पहले, आंध्र प्रदेश के अनंतपुर ज़िले के बदनापल्ली गांव में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) की शुरुआत की गई थी।

रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा,

“पिछले वर्षों में इस कानून ने ग्रामीण परिवारों (खासकर महिलाओं) को 180 करोड़ मानव-दिवस का रोज़गार दिया, अनुमानित 10 करोड़ सामुदायिक परिसंपत्तियों का निर्माण किया, मजबूरी में होने वाले पलायन को काफी हद तक कम किया, ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाया और ग्रामीण गरीबों की मज़दूरी के लिए मोलभाव करने की ताकत को निर्णायक रूप से बढ़ाया।”

उन्होंने कहा कि इसी के तहत प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) की पहल शुरू हुई, जिससे मज़दूरी सीधे बैंक और डाकघर खातों में जमा की जाने लगी।

कांग्रेस नेता के अनुसार, छोटे और सीमांत किसानों को अपने खेतों में कुएँ खोदने जैसी सिंचाई सुविधाएँ खुद विकसित करने का अवसर भी मिला।

रमेश ने ज़ोर देकर कहा कि मनरेगा कोई प्रशासनिक वादा नहीं, बल्कि मांग-आधारित कानूनी गारंटी था।

उन्होंने कहा,

“यह संविधान के अनुच्छेद 41 से प्राप्त एक अधिकार था। नागरिकों की मांग पर काम आवंटित किया जाता था और ग्रामीण भारत में कहीं भी उपलब्ध कराया जाता था। परियोजनाओं का निर्णय स्थानीय ग्राम पंचायत करती थी, और कुल लागत का केवल 10 प्रतिशत राज्य सरकार को वहन करना पड़ता था, जिससे बिना अधिक वित्तीय बोझ के रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए राज्यों को प्रोत्साहन मिलता था।”

रमेश ने यह भी कहा कि ग्राम सभा के माध्यम से सामाजिक अंकेक्षण और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा उच्च-स्तरीय ऑडिट नियमित रूप से किए जाते थे।

उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार का नया कानून केवल नई दिल्ली में केंद्रीकरण की गारंटी देता है।

रमेश के अनुसार, अब काम कुछ चुनिंदा ज़िलों में ही मोदी सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाएगा।

उन्होंने कहा,

“अब काम नागरिकों की मांग के बजाय सरकार द्वारा आवंटित बजट के आधार पर दिया जाएगा। हर साल कृषि की चरम गतिविधियों के दौरान दो महीनों के लिए योजना पूरी तरह बंद रहेगी — यह मज़दूरों की सौदेबाज़ी क्षमता पर बड़ा प्रहार है, क्योंकि वे कृषि कार्यों के लिए बेहतर मज़दूरी पर बातचीत नहीं कर पाएँगे।”

उन्होंने कहा कि पंचायतों को हाशिये पर डाल दिया गया है, और परियोजनाएँ अब मोदी सरकार अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार तय करेगी।

रमेश ने यह भी दावा किया कि अब राज्यों को 40 प्रतिशत लागत वहन करनी होगी। मौजूदा वित्तीय दबावों के चलते वे ऐसा करने में सक्षम नहीं होंगे और अंततः काम देना बंद कर देंगे।

उन्होंने निष्कर्ष में कहा,

“मनरेगा एक परिवर्तनकारी कानून था। मोदी सरकार की नई योजना, जिसने इसे बुलडोज़ कर दिया, एक खामी है।”

रमेश ने 20 साल पुरानी एक तस्वीर भी साझा की, जब बदनापल्ली की दलित महिला चीमला पेदक्का मनरेगा के तहत पहली जॉब कार्ड धारक बनी थीं।

केंद्र सरकार का विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 [VB-G RAM-G] संसद के दोनों सदनों से विपक्ष के हंगामे के बीच पारित हुआ और दिसंबर 2025 में राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिलने के बाद लागू हुआ। इस कानून ने दो दशकों बाद मनरेगा को प्रभावी रूप से प्रतिस्थापित कर दिया।

नए कानून के तहत कागज़ों पर प्रति ग्रामीण परिवार वार्षिक रोज़गार गारंटी को 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन किया गया है, साथ ही फंडिंग पैटर्न, योजना निर्माण और क्रियान्वयन ढांचे में बदलाव किए गए हैं।

हालाँकि विपक्षी दलों का तर्क है कि यह नया कानून मनरेगा की अधिकार-आधारित प्रकृति को कमजोर करता है, सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ाता है और राज्यों पर अधिक वित्तीय बोझ डालता है, जिससे काम का मूल कानूनी अधिकार कमजोर पड़ सकता है।

(पीटीआई)