
वॉशिंगटन, 5 फरवरी (एपी)
ट्रंप प्रशासन ने बुधवार को घोषणा की कि वह अपने सहयोगी और साझेदार देशों के साथ मिलकर एक क्रिटिकल मिनरल्स ट्रेडिंग ब्लॉक बनाना चाहता है। इसका उद्देश्य टैरिफ (शुल्क) के ज़रिए न्यूनतम कीमतें बनाए रखना और उन अहम खनिजों पर चीन की पकड़ को चुनौती देना है, जिनकी जरूरत फाइटर जेट से लेकर स्मार्टफोन तक हर चीज़ में पड़ती है।
उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने कहा कि बीते एक साल में अमेरिका–चीन व्यापार युद्ध ने यह उजागर कर दिया है कि अधिकांश देश उन क्रिटिकल मिनरल्स पर कितने निर्भर हैं, जिन पर चीन का दबदबा है। इसलिए अब पश्चिमी देशों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सामूहिक कार्रवाई ज़रूरी है।
वेंस ने कहा, “हम चाहते हैं कि सहयोगी और साझेदार देश एक ऐसा ट्रेडिंग ब्लॉक बनाएं, जो अमेरिकी औद्योगिक क्षमता तक अमेरिका की पहुंच सुनिश्चित करे और पूरे क्षेत्र में उत्पादन को भी बढ़ाए।”
उन्होंने यह बात उस बैठक के उद्घाटन पर कही, जिसकी मेज़बानी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने की और जिसमें यूरोप, एशिया और अफ्रीका के कई दर्जन देशों के अधिकारी शामिल हुए।
रिपब्लिकन प्रशासन इलेक्ट्रिक वाहनों, मिसाइलों और अन्य हाई-टेक उत्पादों के लिए ज़रूरी क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति मज़बूत करने के लिए आक्रामक कदम उठा रहा है। यह कदम तब उठाए गए जब चीन ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पिछले साल लगाए गए व्यापक टैरिफ के जवाब में इन खनिजों की आपूर्ति सीमित कर दी थी।
हालांकि दोनों देशों के बीच उच्च आयात शुल्क और रेयर अर्थ प्रतिबंधों को लेकर एक अस्थायी समझौता हुआ, लेकिन चीन की पाबंदियां ट्रंप के पद संभालने से पहले की तुलना में अब भी सख्त बनी हुई हैं।
यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब वॉशिंगटन और उसके प्रमुख सहयोगियों के बीच तनाव है। इसमें ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं और वेनेजुएला व अन्य देशों पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिशें शामिल हैं। अमेरिकी साझेदारों के प्रति उनके आक्रामक और अपमानजनक बयानों से नाराज़गी और असंतोष बढ़ा है।
हालांकि, यह सम्मेलन इस बात का संकेत भी है कि अमेरिका उन मुद्दों पर रिश्ते मज़बूत करना चाहता है, जिन्हें वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम मानता है।
फ्रांस और ब्रिटेन जैसे प्रमुख सहयोगी बैठक में शामिल हुए, लेकिन खनिज-संपन्न आर्कटिक द्वीप ग्रीनलैंड और उस पर प्रशासनिक नियंत्रण रखने वाला नाटो सहयोगी डेनमार्क इसमें शामिल नहीं हुए।
चीन को चुनौती देने की नई रणनीति
वेंस ने कहा कि कुछ देशों ने इस ट्रेडिंग ब्लॉक में शामिल होने पर सहमति दे दी है। इसका मकसद स्थिर कीमतें सुनिश्चित करना है और सदस्य देशों को वित्तपोषण व क्रिटिकल मिनरल्स तक पहुंच देना है।
प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि यह योजना पश्चिमी देशों को केवल समस्या पर शिकायत करने से आगे बढ़ाकर उसका समाधान करने में मदद करेगी।
रुबियो ने कहा, “यहां मौजूद हर किसी की भूमिका है, और इसलिए हम आपके आने के लिए आभारी हैं। मुझे उम्मीद है कि यह केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ठोस कार्रवाई की ओर ले जाएगा।”
वेंस ने कहा कि चीन लंबे समय से सस्ती कीमतों पर सामग्री बेचकर संभावित प्रतिस्पर्धियों को कमजोर करता रहा है और फिर बाद में कीमतें बढ़ा देता है, जिससे अन्य देशों में नई खदानें विकसित नहीं हो पातीं।
उन्होंने कहा कि इस प्राथमिक व्यापार क्षेत्र में कीमतें समय के साथ स्थिर बनी रहेंगी।
उन्होंने कहा, “इस ज़ोन के भीतर हमारा लक्ष्य उत्पादन के विविध केंद्र बनाना, स्थिर निवेश माहौल तैयार करना और ऐसी सप्लाई चेन विकसित करना है जो बाहरी झटकों से सुरक्षित रहें।”
हालांकि, इस ट्रेडिंग समूह को सफल बनाने के लिए यह सुनिश्चित करना ज़रूरी होगा कि देश सस्ते चीनी खनिजों को चोरी-छिपे न खरीदें और कंपनियों को चीन पर निर्भर होने से रोका जा सके। यह बात कोलोराडो स्कूल ऑफ माइंस के अर्थशास्त्र प्रोफेसर और रेयर अर्थ विशेषज्ञ इयान लैंगे ने कही।
उन्होंने कहा, “यह सामान्य आर्थिक व्यवहार है। अगर मैं धोखा देकर बच सकता हूं, तो ऐसा करूंगा।”
लैंगे के मुताबिक रक्षा ठेकेदारों के मामले में पेंटागन यह तय कर सकता है कि वे खनिज कहां से लें, लेकिन इलेक्ट्रिक वाहन निर्माताओं और अन्य कंपनियों पर ऐसा नियंत्रण मुश्किल हो सकता है।
रणनीतिक भंडार और निवेश की ओर अमेरिका
ट्रंप ने इस सप्ताह प्रोजेक्ट वॉल्ट की भी घोषणा की, जिसके तहत रेयर अर्थ तत्वों का एक रणनीतिक अमेरिकी भंडार बनाया जाएगा। इसे यूएस एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक से 10 अरब डॉलर के ऋण और करीब 1.67 अरब डॉलर की निजी पूंजी से वित्तपोषित किया जाएगा।
इसके अलावा, सरकार ने हाल ही में एक अमेरिकी क्रिटिकल मिनरल्स उत्पादक में चौथा प्रत्यक्ष निवेश किया है। इसके तहत USA Rare Earth को 1.6 अरब डॉलर दिए गए हैं, बदले में शेयर और पुनर्भुगतान समझौते के तहत।
पिछले एक साल में पेंटागन ने खनन को बढ़ावा देने के लिए लगभग 5 अरब डॉलर खर्च किए हैं।
प्रशासन ने इन कदमों को प्राथमिकता दी है क्योंकि चीन दुनिया के 70 प्रतिशत रेयर अर्थ खनन और 90 प्रतिशत प्रोसेसिंग को नियंत्रित करता है।
ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बुधवार को फोन पर बातचीत की, जिसमें व्यापार पर भी चर्चा हुई। ट्रंप की सोशल मीडिया पोस्ट में विशेष रूप से क्रिटिकल मिनरल्स का ज़िक्र नहीं था।
काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस की भू-अर्थशास्त्रीय अध्ययन केंद्र की सीनियर फेलो हाइडी क्रेबो-रेडिकर ने इस बैठक को “ट्रंप प्रशासन की अब तक की सबसे महत्वाकांक्षी बहुपक्षीय बैठक” बताया।
उन्होंने कहा, “खनिज वहीं होते हैं जहां वे प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं, इसलिए रक्षा और वाणिज्यिक उद्योगों की सप्लाई चेन सुरक्षित करने के लिए हमें भरोसेमंद साझेदारों की ज़रूरत है।”
जापान के विदेश मामलों के राज्य मंत्री इवाओ होरिई ने कहा कि टोक्यो इस अमेरिकी पहल के साथ पूरी तरह खड़ा है और इसकी सफलता के लिए अधिक से अधिक देशों के साथ काम करेगा।
उन्होंने कहा, “क्रिटिकल मिनरल्स और उनकी स्थिर आपूर्ति वैश्विक अर्थव्यवस्था के सतत विकास के लिए अनिवार्य है।”
समझौते और कानून आगे बढ़े
यूरोपीय संघ और जापान ने संयुक्त रूप से, साथ ही मेक्सिको ने भी, अमेरिका के साथ समन्वित व्यापार नीतियां और मूल्य-सीमा तय करने के समझौते की घोषणा की, ताकि चीन से बाहर क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन विकसित की जा सके।
इन देशों ने कहा कि वे इस बारे में एक औपचारिक समझौता तैयार करेंगे और समान सोच वाले अन्य देशों को भी इसमें शामिल करने के तरीकों पर विचार करेंगे।
इसी दिन, रिपब्लिकन-नियंत्रित अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने संघीय भूमि पर खनन को तेज़ करने वाला एक विधेयक भी पारित किया। डेमोक्रेट्स और पर्यावरण समूहों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह विदेशी स्वामित्व वाली खनन कंपनियों को खुली छूट देने जैसा है।
यह विधेयक अब सीनेट में जाएगा और इसका उद्देश्य ट्रंप के उन कार्यकारी आदेशों को कानून का रूप देना है, जिनसे ऊर्जा, रक्षा और अन्य क्षेत्रों के लिए अहम खनिजों के घरेलू खनन और प्रसंस्करण को बढ़ावा दिया जा सके।
(एपी)
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