चुनावी ‘फ्रीबीज़’ के वादों के खिलाफ याचिका पर सुनवाई को सुप्रीम कोर्ट राज़ी

New Delhi: Media representatives outside the Supreme Court, in New Delhi, Wednesday, Feb. 4, 2026. The Supreme Court will hear a plea filed by West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee challenging the ongoing Special Intensive Revision (SIR) of electoral rolls in the state. (PTI Photo/Kamal Kishore) (PTI02_04_2026_000123B)

नई दिल्ली, 5 फरवरी (पीटीआई)

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर मार्च में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई, जिसमें चुनाव से पहले “अतार्किक फ्रीबीज़” का वादा करने या उनका वितरण करने वाली राजनीतिक पार्टियों का चुनाव चिह्न जब्त करने या उनका पंजीकरण रद्द करने के निर्देश देने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता वकील अश्विनी उपाध्याय ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ को बताया कि इस याचिका पर केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग को वर्ष 2022 में ही नोटिस जारी किए जा चुके हैं और मामले को शीघ्र सूचीबद्ध किया जाए।

उपाध्याय ने कहा, “सूरज और चांद को छोड़कर बाकी हर चीज़ का वादा राजनीतिक पार्टियां चुनाव के दौरान मतदाताओं से करती हैं और यह एक भ्रष्ट आचरण है।”

इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। आप अंत में इसे याद दिलाइए, हम मार्च में इसकी सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करेंगे।”

25 जनवरी 2022 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमण की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा था। पीठ ने इसे “गंभीर मुद्दा” बताते हुए कहा था कि कई बार “फ्रीबी बजट नियमित बजट से भी आगे निकल जाता है।”

याचिका में अदालत से यह घोषित करने की मांग की गई है कि चुनाव से पहले सार्वजनिक धन से “अतार्किक फ्रीबीज़” देने का वादा मतदाताओं को अनुचित रूप से प्रभावित करता है, समान अवसर के सिद्धांत को बाधित करता है और चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता को नुकसान पहुंचाता है।

अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर याचिका में वैकल्पिक रूप से केंद्र सरकार को इस विषय पर कानून बनाने का निर्देश देने की भी मांग की गई है।

याचिका में कहा गया है, “चुनाव को ध्यान में रखकर मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए फ्रीबीज़ देने की हालिया प्रवृत्ति न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है, बल्कि संविधान की भावना को भी आघात पहुंचाती है।”

इसमें कहा गया कि यह अनैतिक प्रथा सत्ता में बने रहने के लिए सरकारी खजाने की कीमत पर मतदाताओं को रिश्वत देने जैसी है और लोकतांत्रिक सिद्धांतों और प्रक्रियाओं की रक्षा के लिए इसे रोका जाना चाहिए।

याचिका में निर्वाचन आयोग को यह निर्देश देने की भी मांग की गई है कि वह चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 में एक अतिरिक्त शर्त जोड़े, जिसके तहत कोई भी राजनीतिक पार्टी चुनाव से पहले सार्वजनिक धन से अतार्किक फ्रीबीज़ का वादा या वितरण न करे।

याचिकाकर्ता ने यह भी आग्रह किया है कि सुप्रीम कोर्ट यह घोषित करे कि चुनाव से पहले सार्वजनिक धन से निजी वस्तुओं या सेवाओं (जो सार्वजनिक उद्देश्य के लिए नहीं हैं) का वादा या वितरण संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) सहित कई अनुच्छेदों का उल्लंघन है।

याचिका में कुछ राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक पार्टियों द्वारा किए जा रहे वादों का भी उल्लेख किया गया है।

याचिका के अनुसार, लोकतंत्र की धुरी चुनावी प्रक्रिया है, लेकिन धन वितरण और फ्रीबीज़ के वादे खतरनाक स्तर तक पहुंच चुके हैं, जिसके चलते कई बार चुनाव रद्द तक करने पड़े हैं।

इसमें कहा गया है कि अतार्किक फ्रीबीज़ के मनमाने वादे निर्वाचन आयोग के स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के संवैधानिक दायित्व का उल्लंघन करते हैं और सार्वजनिक धन से निजी वस्तुओं व सेवाओं का वितरण संविधान के अनुच्छेद 14, 162, 266(3) और 282 का स्पष्ट उल्लंघन है।

श्रेणी: ब्रेकिंग न्यूज़

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