रांची, 16 फरवरी (भाषा)। झारखंड उच्च न्यायालय ने सोमवार को चतरा के पुलिस अधीक्षक सुमित अग्रवाल से पूछा कि कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना लावालोंग पुलिस थाने में दो छात्रों को 10 दिनों तक हिरासत में क्यों रखा गया।
एक छात्रा की मां अख्तरी खांटुन द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की खंडपीठ के समक्ष एसपी व्यक्तिगत रूप से पेश हुए।
पुलिस ने जबरन वसूली रैकेट में शामिल होने का आरोप लगाते हुए 26 जनवरी की तड़के दोनों छात्रों को गिरफ्तार किया था।
हालाँकि, उन्हें रिहा नहीं किया गया और वे 10 दिनों तक हिरासत में रहे, जिसके बाद याचिका दायर की गई।
अदालत ने एसपी के साथ बातचीत करते हुए कहा कि पुलिस को समाज पर अपनी छाप छोड़ने की जरूरत है।
अदालत ने कहा कि अगर छात्र को पूछताछ के बाद छोड़ दिया जाता, तो इससे समाज को एक अच्छा संदेश मिलता।
एक छात्र एक कट्टर अपराधी नहीं है। पीठ ने कहा कि अगर वह होता तो मामला दर्ज किया जाता और उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता या न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाता।
अदालत ने कहा कि पुलिस ने छात्र को बिना किसी कारण के पुलिस थाने में रखा, जो कानून की प्रक्रिया से परे है।
लावालोंग पुलिस थाने के समक्ष लंबित मामले की केस डायरी भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई।
केस डायरी में छात्र को हिरासत में लेने की बात नहीं है। न्यायाधीशों ने कहा कि इसलिए, पुलिस स्टेशन में उसकी हिरासत दर्ज नहीं की गई है।
मामले की सुनवाई 27 फरवरी को फिर से होगी। पीटीआई कोर नाम एमएनबी
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