प्रस्तावित अमेरिका समझौते के तहत सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिल सकती है, हथियार नियंत्रण विशेषज्ञों ने जताई चिंता

**EDS: FILE PHOTO** Washington: In this undated file photo, then US president Joe Biden during Diwali festival celebration at the White House, in Washington, DC, USA. Biden has been diagnosed with aggressive prostate cancer, his office said on Sunday, May 18, 2025. (PTI Photo)(PTI05_19_2025_000002B)

दुबई, 20 फरवरी (एपी) कांग्रेस के दस्तावेजों और एक हथियार नियंत्रण समूह के अनुसार, प्रस्तावित परमाणु समझौते के तहत सऊदी अरब को अपने देश में किसी रूप में यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) की अनुमति मिल सकती है। ऐसे में प्रसार (प्रोलिफरेशन) को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं, खासकर तब जब ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु मुद्दे पर गतिरोध जारी है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडेन दोनों ने सऊदी अरब के साथ परमाणु समझौता कर अमेरिकी तकनीक साझा करने की कोशिश की थी। अप्रसार (नॉन-प्रोलिफरेशन) विशेषज्ञों का कहना है कि सऊदी अरब में सेंट्रीफ्यूज चलने की स्थिति संभावित हथियार कार्यक्रम का रास्ता खोल सकती है। सऊदी क्राउन प्रिंस पहले संकेत दे चुके हैं कि यदि तेहरान परमाणु बम हासिल करता है तो वह भी ऐसा कदम उठा सकते हैं।

इस बीच, सऊदी अरब और परमाणु-सशस्त्र पाकिस्तान ने पिछले वर्ष आपसी रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जब इजराइल ने कतर में हमास अधिकारियों को निशाना बनाते हुए हमला किया था। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने तब कहा था कि जरूरत पड़ने पर उनका परमाणु कार्यक्रम सऊदी अरब के लिए “उपलब्ध” कराया जाएगा। इसे इजराइल के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा गया, जिसे लंबे समय से मध्य पूर्व का एकमात्र परमाणु-सशस्त्र देश माना जाता है।

वाशिंगटन स्थित आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन में नॉन-प्रोलिफरेशन नीति की निदेशक केल्सी डेवनपोर्ट ने लिखा, “परमाणु सहयोग अप्रसार मानकों को बनाए रखने और पारदर्शिता बढ़ाने का सकारात्मक माध्यम हो सकता है, लेकिन असली बात समझौते के विवरण में छिपी है।”

दस्तावेजों से “यह चिंता उत्पन्न होती है कि ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब के साथ प्रस्तावित परमाणु सहयोग समझौते से जुड़े प्रसार जोखिमों या इससे स्थापित होने वाले संभावित उदाहरण पर पर्याप्त विचार नहीं किया है।” सऊदी अरब ने एसोसिएटेड प्रेस के सवालों का शुक्रवार तक कोई जवाब नहीं दिया।

कांग्रेस रिपोर्ट में संभावित समझौते का खाका

कांग्रेस के दस्तावेज, जिन्हें एपी ने भी देखा, बताते हैं कि ट्रंप प्रशासन दुनिया भर के देशों के साथ 20 परमाणु व्यापार समझौते करना चाहता है, जिनमें सऊदी अरब भी शामिल है। दस्तावेज के अनुसार, सऊदी अरब के साथ यह समझौता अरबों डॉलर का हो सकता है।

दस्तावेज में कहा गया है कि इस समझौते से “अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को बढ़ावा मिलेगा और निष्क्रियता व अनिर्णय की विफल नीतियों से अलग राह अपनाई जाएगी, जिनका लाभ हमारे प्रतिस्पर्धियों ने उठाकर अमेरिकी उद्योग को नुकसान पहुंचाया और इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अमेरिका की स्थिति को कमजोर किया।” चीन, फ्रांस, रूस और दक्षिण कोरिया उन प्रमुख देशों में शामिल हैं जो विदेशों में परमाणु ऊर्जा संयंत्र तकनीक बेचते हैं।

मसौदा समझौते के तहत अमेरिका और सऊदी अरब संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था — अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) — के साथ सुरक्षा समझौतों में शामिल होंगे। इसमें “परमाणु सहयोग के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों” की निगरानी शामिल होगी। संभावित क्षेत्रों में संवर्धन, ईंधन निर्माण और पुनःप्रसंस्करण का उल्लेख किया गया है।

डेवनपोर्ट ने लिखा, “यह संकेत देता है कि द्विपक्षीय सुरक्षा समझौता लागू होने के बाद सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन तकनीक या क्षमता — संभवतः अमेरिका से भी — प्राप्त करने का मार्ग मिल सकता है। प्रतिबंधों और सीमाओं के बावजूद, यह संभव है कि सऊदी अरब को किसी न किसी रूप में संवर्धन या उससे संबंधित ज्ञान तक पहुंच मिल जाए।”

सऊदी अरब आईएईए का सदस्य देश है। वियना स्थित यह एजेंसी शांतिपूर्ण परमाणु कार्यों को बढ़ावा देती है और यह सुनिश्चित करने के लिए निरीक्षण भी करती है कि कोई देश गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम न चला रहा हो।

आईएईए ने एपी को शुक्रवार को दिए बयान में कहा कि वह “दोनों पक्षों के साथ नियमित संपर्क बनाए रखता है और द्विपक्षीय सहयोग समझौतों के संदर्भ में सत्यापन उपाय लागू करने में सक्षम है।” एजेंसी ने कहा कि यदि पक्ष अनुरोध करेंगे, तो वह स्थापित प्रक्रियाओं के अनुसार सत्यापन उपाय लागू करेगी।

यूरेनियम संवर्धन अपने आप में परमाणु हथियार का सीधा मार्ग नहीं है — इसके लिए उच्च विस्फोटकों के समन्वित उपयोग जैसे अन्य चरणों में महारत भी जरूरी होती है। हालांकि, यह हथियारीकरण का रास्ता खोलता है, जिसने ईरान के कार्यक्रम को लेकर पश्चिमी देशों की चिंताओं को बढ़ाया है।

सऊदी अरब के पड़ोसी संयुक्त अरब अमीरात ने अमेरिका के साथ तथाकथित “123 समझौता” किया था, जिसके तहत उसने दक्षिण कोरिया की सहायता से बराकाह परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाया। लेकिन यूएई ने संवर्धन की मांग नहीं की, जिसे अप्रसार विशेषज्ञ परमाणु ऊर्जा चाहने वाले देशों के लिए “स्वर्ण मानक” मानते हैं।

ईरान तनाव के बीच प्रस्ताव

सऊदी-अमेरिका समझौते की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब ट्रंप ईरान को चेतावनी दे रहे हैं कि यदि उसने अपने परमाणु कार्यक्रम पर समझौता नहीं किया तो सैन्य कार्रवाई की जा सकती है। ईरान में हालिया राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों के दौरान उसकी धार्मिक सरकार ने कड़ी कार्रवाई की, जिसमें हजारों लोगों की मौत हुई और हजारों को हिरासत में लिया गया।

ईरान लंबे समय से अपने परमाणु संवर्धन कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बताता रहा है। हालांकि, पश्चिमी देशों और आईएईए का कहना है कि 2003 तक ईरान के पास संगठित सैन्य परमाणु कार्यक्रम था। तेहरान 60 प्रतिशत तक यूरेनियम संवर्धन कर चुका है, जो 90 प्रतिशत के हथियार-ग्रेड स्तर से केवल एक तकनीकी कदम दूर है — और बिना हथियार कार्यक्रम घोषित किए ऐसा करने वाला वह दुनिया का एकमात्र देश है।

ईरानी राजनयिक अक्सर 86 वर्षीय सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के उस धार्मिक आदेश (फतवा) का हवाला देते रहे हैं, जिसमें कहा गया है कि ईरान परमाणु बम नहीं बनाएगा। हालांकि, अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव के बीच ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि वे बम हासिल करने का विकल्प तलाश सकते हैं।

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, जो देश के वास्तविक शासक माने जाते हैं, पहले कह चुके हैं कि यदि ईरान परमाणु बम हासिल करता है तो “हमें भी एक लेना होगा।” (एपी)