
New Delhi, 11 मार्च (पीटीआई) Supreme Court of India ने बुधवार को 12 साल से अधिक समय से कोमा में पड़े 31 वर्षीय व्यक्ति को कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली हटाकर निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु का अर्थ है किसी मरीज को जीवित रखने के लिए आवश्यक इलाज या जीवन रक्षक प्रणाली को रोककर या हटाकर उसे प्राकृतिक रूप से मरने देना।
हरीश राणा को 2013 में एक इमारत की चौथी मंजिल से गिरने के बाद सिर में गंभीर चोट लगी थी और तब से वह कोमा में हैं।
न्यायमूर्ति J. B. Pardiwala और K. V. Viswanathan की पीठ ने All India Institute of Medical Sciences को निर्देश दिया कि राणा को पेलिएटिव केयर (लक्षणों को कम करने वाली चिकित्सा देखभाल) में भर्ती किया जाए ताकि उनका इलाज धीरे-धीरे बंद किया जा सके।
पीठ ने कहा कि इलाज इस तरह की विशेष योजना के तहत बंद किया जाना चाहिए जिससे मरीज की गरिमा बनी रहे।
शीर्ष अदालत ने पहले 31 वर्षीय व्यक्ति के माता-पिता से मिलने की इच्छा भी जताई थी। अदालत ने एम्स-दिल्ली के डॉक्टरों के द्वितीयक मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट देखी थी, जिसमें राणा के चिकित्सा इतिहास का विवरण था और अदालत ने इसे “दुखद” बताया था।
प्राथमिक मेडिकल बोर्ड ने मरीज की स्थिति की जांच के बाद कहा था कि उसके ठीक होने की संभावना नगण्य है।
11 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि प्राथमिक मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार मरीज की स्थिति “बहुत दयनीय” है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2023 में जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, किसी मरीज के वेजिटेटिव अवस्था में होने पर उसकी कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली हटाने के लिए प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड की विशेषज्ञ राय लेना अनिवार्य है।
