प्रयागराज (UP), 30 अगस्त (PTI) – इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विवाह का पंजीकरण न होना विवाह को अमान्य नहीं करता। राज्य सरकारें विवाह पंजीकरण के नियम बनाने का अधिकार रखती हैं, लेकिन इसका उद्देश्य केवल विवाह का सुविधाजनक प्रमाण प्रदान करना है।
जस्टिस मनीष निगम ने 26 अगस्त के अपने आदेश में यह बात कही, जिसमें उन्होंने आजमगढ़ के एक फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द किया, जिसने पंजीकरण प्रमाण पत्र न प्रस्तुत करने पर याचिकाकर्ता की छूट की याचिका को खारिज कर दिया था।
फैमिली कोर्ट ने याचिकाकर्ता से शादी का प्रमाण पत्र 29 जुलाई 2025 तक प्रस्तुत करने को कहा था, लेकिन याचिकाकर्ता ने बताया कि उनके पास ऐसा प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं है और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत पंजीकरण अनिवार्य नहीं है। विरोधी पक्ष और याचिकाकर्ता दोनों ने इस आवेदन का समर्थन किया था।
हाई कोर्ट ने कहा कि विवाह केवल इसलिए अमान्य नहीं होगा क्योंकि वह पंजीकृत नहीं है। पंजीकरण केवल विवाह को साबित करने के लिए सहूलियत प्रदान करता है। कोर्ट ने समापन करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा पंजीकरण प्रमाण पत्र को अनिवार्य मानना “पूर्णतया अनुचित” था और इस आदेश को रद्द किया गया है।
यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट और अन्य उच्च न्यायालयों के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप है, जिसमें कहा गया है कि विवाह की वैधता के लिए पंजीकरण जरूरी नहीं है यदि विवाह विधिवत संपन्न हुआ हो।
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