केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने स्पष्ट किया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाना पूरी तरह से सांसदों का विशेषाधिकार है और इसमें सरकार की कोई सीधी भूमिका नहीं है।
मेघवाल ने कहा कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजय खन्ना द्वारा गठित इन-हाउस समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच कर अपनी रिपोर्ट पहले ही सौंप दी है। लेकिन किसी न्यायाधीश को पद से हटाने की प्रक्रिया संसद के माध्यम से ही होती है और इसके लिए शुरूआत सांसदों द्वारा स्वयं की जाती है, न कि सरकार द्वारा।
उन्होंने कहा:
“संविधान के अनुसार, किसी सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को हटाने के लिए लोकसभा में कम-से-कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों का समर्थन होना ज़रूरी है।”
मेघवाल ने दोहराया कि यह पूरी प्रक्रिया संसद का हिस्सा है और सरकार इसमें ‘चित्र में नहीं’ है। उन्होंने कहा कि यदि प्रस्ताव को लोकसभा अध्यक्ष द्वारा स्वीकार किया जाता है, तो न्यायाधीश के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की जाएगी।
उन्होंने यह भी कहा कि:
“जस्टिस वर्मा को संविधान के तहत यह अधिकार है कि वे सुप्रीम कोर्ट का रुख करें, जैसा कि उन्होंने किया है, और रिपोर्ट तथा सिफारिश को चुनौती दे सकते हैं।”
इस बीच, जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर इन-हाउस समिति की रिपोर्ट और 8 मई को दी गई सिफारिश को रद्द करने की मांग की है जिसमें उन्हें “दुराचार” का दोषी माना गया है।
कानून मंत्री ने यह भी कहा कि विपक्षी नेता जयराम रमेश पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि उनकी पार्टी कांग्रेस के सांसद भी इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करेंगे।
मेघवाल ने कहा:
“यह मामला राजनीति से ऊपर है। सांसदों की भावना और नाराजगी इस प्रस्ताव को आगे बढ़ा रही है, न कि कोई सरकारी चाल।”
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह प्रक्रिया कार्यपालिका (executive) नहीं बल्कि विधायिका (legislature) द्वारा संचालित होती है और संविधान द्वारा सांसदों को प्रदत्त विशेषाधिकार के तहत होती है।
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