सारिस्का टाइगर रिजर्व की सीमाओं के पुनः निर्धारण पर CEC ने सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी की सिफारिश की

नई दिल्ली, 31 जुलाई (PTI) — सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार गठित केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) ने राजस्थान के सारिस्का टाइगर रिजर्व की सीमाओं के पुनः निर्धारण (रैशनलाइजेशन) को मंजूरी देने की सुप्रीम कोर्ट से सिफारिश की है। इसमें मुख्य बाघ आवास क्षेत्र (Critical Tiger Habitat) भी शामिल है, हालांकि पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है कि इस बदलाव से पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोके गए खनन कार्यों को वैधानिक मान्यता मिलने का रास्ता खुल सकता है।

यह सिफारिश CEC की 22 जुलाई 2025 को दायर अंतरिम रिपोर्ट में की गई है, जो अमिकस क्यूरिएई के रूप में K परमहंस द्वारा दायर सुप्रीम कोर्ट के suo motu मामले से जुड़ी है। इसमें सारिस्का के संरक्षण एवं प्रबंधन से जुड़ी समस्याएँ जैसे पांडुपोल हनुमान मंदिर पर तीर्थयात्रियों की असीमित आवाजाही, बाघों के टुकड़ों में बटे आवास क्षेत्र और पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र में खनन विवादों को उजागर किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने 12 जुलाई 2023 और 13 मार्च 2024 के आदेशों में एक विशेषज्ञ समिति गठित की और CEC को समग्र समाधान प्रस्तुत करने का आदेश दिया। CEC की जुलाई 2024 की रिपोर्ट में भी मुख्य बाघ आवास और अभयारण्य की सीमाओं के पुनः निर्धारण का प्रस्ताव था, साथ ही मंदिर तक निजी वाहनों पर प्रतिबंध, मार्च 2025 तक इलेक्ट्रिक शटल बसों की शुरुआत तथा मंदिर परिसर में खाना पकाने पर प्रतिबंध की सिफारिश की गई थी।

दिसंबर 2024 में कोर्ट ने पर्यावरण समूहों और मंदिर प्रबंधन की टिप्पणियों के कारण CEC की सिफारिशों की समीक्षा के लिए संयुक्त समिति गठित की।

ताजा रिपोर्ट में CEC ने उल्लेख किया कि राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति, जिसका नेतृत्व पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव करते हैं, पहले ही प्रस्ताव को मंजूरी दे चुकी है। इसमें मुख्य बाघ आवास क्षेत्र को 881.11 वर्ग किलोमीटर से बढ़ाकर 924.49 वर्ग किलोमीटर किया गया है, जबकि बफर जोन को 245.72 से घटाकर 203.20 वर्ग किलोमीटर किया गया है। कुल अधिसूचित क्षेत्र 1,127.68 वर्ग किलोमीटर तक बढ़ा है।

इस प्रस्ताव को मुख्यमंत्री वन्यजीव रक्षक, राज्य वन्यजीव बोर्ड, राजस्थान सरकार और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने भी समर्थन दिया है।

CEC रिपोर्ट के अनुसार इस पुनः निर्धारण का आधार बाघ प्रजनन के पैटर्न के वैज्ञानिक डेटा एवं कैमरा ट्रैप साक्ष्यों पर आधारित है, और इसका उद्देश्य संरक्षण क्षेत्र की अखंडता बढ़ाना तथा प्रबंधन एवं कानूनी चुनौतियों को समाप्त करना है, जिससे किसी भी गांव का विस्थापन न हो।

पर्यावरणविदों द्वारा खनन को लेकर जताई गई चिंताओं को CEC ने नोट किया है। जबकि कुछ खननकर्ता आशंका जताते हैं कि मौजूदा कानूनी खनन प्रभावित होगा, पर्यावरणविद मानते हैं कि इससे खनन गतिविधियों को फिर से शुरू करने का रास्ता खुलेगा।

CEC ने स्पष्ट किया है कि राज्य को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत सभी विधिक प्रक्रियाओं का पालन करना होगा और सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बिना कोई अंतिम बदलाव नहीं किया जाएगा। उन्होंने छह माह के भीतर पुनः निर्धारित अभयारण्य की पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र के अधिसूचना का आदेश भी दिया है ताकि लंबित खनन मामलों का उचित निस्तारण हो सके।

तीर्थयात्री ट्रैफिक के नियंत्रण हेतु CNG एवं इलेक्ट्रिक बसों के विकल्प को लागू करने की अनुमति देने और कच्चे रास्तों को पर्यावरण अनुकूल मैकाडम से सुधारने की सिफारिश की गई है। मंदिर परिसर में खाना पकाने पर प्रतिबंध के आदेश के अनुरूप एलपीजी उपयोग, रूफटॉप सोलर पैनल स्थापना और लकड़ी व प्लास्टिक पर प्रतिबंध का भी उल्लेख किया गया है।

CEC ने सिलिसेरह झील को अंतरराष्ट्रीय महत्व के जलभ्रम क्षेत्र के रूप में नामित करने का भी प्रस्ताव पर्यावरण मंत्रालय को दिया है।

CEC ने अदालत से पुनः निर्धारण को Wildlife (Protection) Act की धारा 26A(1)(b) के तहत अधिसूचित करने और 989.68 हेक्टेयर राजस्व भूमि के लिए संबंधित विधिक प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद मंजूरी देने का अनुरोध किया है।

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