नई दिल्ली, 5 अगस्त (PTI) — सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि आरोपी के व्यवहार के आधार पर ही, यदि मजबूत और विश्वसनीय सहायक साक्ष्य न हों, तो सजा की पुष्टि नहीं की जा सकती। अदालत ने हत्या के एक मामले में एक व्यक्ति को बरी कर दिया।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के जनवरी के आदेश के खिलाफ आरोपी की याचिका मंजूर की।
पीठ ने कहा, “संक्षेप में कहें तो आरोपी के व्यवहार अकेले सजा की पुष्टि के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते यदि विश्वसनीय सहायक साक्ष्य उपस्थित न हों।”
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को हत्या का दोषी ठहराया था, लेकिन उच्च न्यायालय ने अपराध को हत्या न होते हुए दोषपूर्ण हत्या (कुल्पेबल होमिसाइड नॉट अमाउंटिंग टू मर्डर) में बदल दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय का न्यायनिर्णय कई कारणों से “त्रुटिपूर्ण” था।
पीठ ने कहा, “पहली गलती यह थी कि उच्च न्यायालय ने दर्ज मेडिकल साक्ष्य का विस्तार से परीक्षण करने के बाद सीधे उसमें आरोपी द्वारा दर्ज एफआईआर की सामग्री से मेल खिलाना शुरू कर दिया।”
अदालत ने कहा कि विशेषज्ञ गवाह के साक्ष्य सलाहकार प्रकार के होते हैं और अकेले इनके आधार पर आरोपी को हत्या का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
राज्य के वकील ने बताया कि आरोपी ने 2019 में पुलिस स्टेशन जाकर मामले में एफआईआर दर्ज कराई थी।
पीठ ने कहा कि अन्य किसी साक्ष्य की तरह आरोपी के व्यवहार को भी सभी साक्ष्य के साथ संयुक्त रूप से देखा जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि जब अदालत यह निर्धारित कर रही हो कि हत्या है या दोषपूर्ण हत्या, तो मामले को तीन चरणों में देखना चाहिए।
पहला चरण है यह तय करना कि क्या आरोपी ने ऐसा कार्य किया जिससे किसी व्यक्ति की मृत्यु हुई।
दूसरा चरण यह कि क्या आरोपी द्वारा किया गया कार्य भारतीय दंड संहिता की धारा 299 के तहत दोषपूर्ण हत्या के अंतर्गत आता है।
अगला चरण धारा 300 के तहत हत्या की परिभाषा का प्रदर्शन करता है।
यदि हत्या की परिभाषा में मामला नहीं आता, तब अपराध दोषपूर्ण हत्या होगा जिसका दंड धारा 304 के प्रथम या द्वितीय भाग के तहत होगा।
यदि हत्या की परिभाषा लागू होती है, लेकिन धारा 300 में उल्लिखित किसी अपवाद के अंतर्गत मामला आता है, तो भी अपराध दोषपूर्ण हत्या माना जाएगा जो धारा 304 के प्रथम भाग के तहत दंडनीय होगा।
PTI
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