नई दिल्ली, 29 अगस्त (PTI) – दिल्ली की एक कोर्ट ने एक सेवानिवृत्त वैज्ञानिक को न्यायिक समय बर्बाद करने और प्रक्रियाओं का दुरुपयोग करने के लिए showcause नोटिस जारी किया है। यह मामला वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के खिलाफ एक सिविल केस से जुड़ा है।
डिस्ट्रिक्ट जज नरेश कुमार लाका ने आरोपी V K C सांघी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है और पूछा है कि अदालत में झूठे दावे करने के लिए उसके खिलाफ अलग से शिकायत क्यों न दर्ज की जाए।
कोर्ट ने यह भी पूछा है कि क्यों उसे बिना किसी ठोस आधार के पत्र दाखिल करने के लिए ₹1 लाख जुर्माना न लगाया जाए और मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम के तहत उसकी जांच क्यों न कराई जाए।
आदेश के अनुसार सांघी 2011 में CSIR-राष्ट्रीय विज्ञान, प्रौद्योगिकी और विकास अध्ययन संस्थान (NISTADS) से सेवानिवृत्त हुए, लेकिन आधिकारिक आवास नहीं छोड़ा।
2013 में CSIR ने उन्हें कानूनी नोटिस भेजा था और 2017 में उस संपत्ति को वापस पाने के लिए मुकदमा दायर किया गया था। 2019 में आंशिक रूप से फैसले के बाद भी उन्होंने आवास खाली नहीं किया।
कोर्ट ने उल्लेख किया कि सांघी ने प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश, CSIR के डायरेक्टर जनरल सहित कई को पत्र लिखा था, जिसमें वे अपनी अलग-अलग शिकायतें और प्रचार सामग्री प्रस्तुत करते रहे।
कोर्ट ने कहा कि यह पत्र मामला से कोई संबंध नहीं रखता और 30 मिनट इसे पढ़ने के दौरान केवल प्रचार सामग्री ही मिली।
यह मामला लगभग आठ वर्षों से लंबित है, और कोर्ट ने कहा कि सांघी कानूनी प्रक्रिया में जानबूझकर देरी करते रहे हैं। उन्होंने करीब 35 बार ईमेल या पत्र के जरिए अदालत का ध्यान भटकाने की कोशिश की।
कोर्ट ने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय, मुख्य न्यायाधीश कार्यालय, दिल्ली हाई कोर्ट और CSIR सभी अपने कार्य में व्यस्त हैं, और इस तरह के निरर्थक पत्रों से उनका कीमती समय व्यर्थ होता है।
अदालत ने पूछा कि क्यों उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 246 (अदालत में झूठा दावा) के तहत अलग से मुकदमा न चलाया जाए।
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