महिला और पुरुष सेना अधिकारियों का स्थायी कमीशन के लिए एक समान मानदंड पर आकलन नहीं हो सकता: सुप्रीम कोर्ट को बताया गया

नई दिल्ली, 6 अगस्त (PTI) — सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि भारतीय सेना के महिला और पुरुष अधिकारी दो अलग-अलग और असमान वर्ग हैं, इसलिए उन्हें स्थायी कमीशन (Permanent Commission – PC) देने के लिए एक ही मापदंड और कट-ऑफ मार्क्स के आधार पर माना नहीं जा सकता।

न्यायाधीश सूर्य कांत, उजल भूयान और एन कोतिस्वर सिंह की बेंच महिला अधिकारियों की ओर से दायर याचिकाओं की सुनवाई कर रही है, जिनमें उन्होंने आरोप लगाया है कि पुरुष अधिकारियों के मुकाबले महिलाओं के साथ भेदभाव हुआ है और उन्हें स्थायी कमीशन से वंचित रखा गया है।

यह याचिकाएँ वर्तमान में सेवा में मौजूद और सेवा से मुक्त हुई महिला अधिकारियों द्वारा दायर की गई हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बताया कि इस मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद नौसेना और वायु सेना के अधिकारियों की याचिकाओं को भी सुना जाएगा, जो स्थायी कमीशन के न मिलने से आहत हैं।

महिला अधिकारियों के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता हुजैफा अहमदी, मेनका गुरुस्वामी, वी मोहन सहित अन्य ने व्यवस्थित भेदभाव की बात उठाई। अहमदी ने जो सितंबर 2010 में कमीशन प्राप्त महिला अधिकारियों का पक्ष रखा, बताया कि उन्हें 15 जनवरी 1991 की नीति के अनुसार स्थायी कमीशन के तहत रिक्तियों का अधिकार था और उस नीति से किसी भी विचलन को अवैध ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि दिसंबर 2020 में चयन बोर्ड ने महिला और पुरुष अधिकारियों को एक समान मानदंड पर स्थायी कमीशन देने का जहां निर्णय लिया, वह समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।

अहमदी ने बताया कि 2020 में जून में होने वाली चयन बोर्ड की बैठक स्थगित कर दी गई थी और अंततः 53 महिलाओं को रिक्तियों के अभाव को आधार बनाकर स्थायी कमीशन से वंचित कर दिया गया। उन्होंने कहा कि रिक्तियों की गणना नीति के अनुसार सही ढंग से नहीं की गई थी क्योंकि नीति के अनुसार रिक्तियों की गणना वर्ष में कमीशन पाकर प्रशिक्षित अधिकारियों की संख्या के आधार पर की जानी चाहिए, न कि चयन बोर्ड के आयोजन वर्ष या परिणाम की घोषणा की तारीख के अनुसार।

अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि महिलाओं की वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों में आकस्मिक ग्रेडिंग की जा रही है और उन्हें पुरुष अधिकारियों के समान अवसर नहीं दिए जा रहे।

कोर्ट ने स्थायी कमीशन प्रदान करने में समान नियम बनाये जाने की संभावना जताई, लेकिन खास प्रशिक्षण जैसे कारकों को ध्यान में रखने की जरूरत भी बताई। कोर्ट ने अधिकारियों से पूछा कि उनके अनुसार स्थायी कमीशन के लिए आकलन का आधार क्या होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट इस मामले में 75 से अधिक याचिकाएं सुन रही है, जो विभिन्न कारणों से स्थायी कमीशन के न मिलने को चुनौती देती हैं। सुनवाई अभी असमाप्त है और 7 अगस्त को जारी रहेगी।

कोर्ट ने कहा कि पूर्व में दिए गए अंतरिम आदेश अभी भी प्रभावी रहेंगे, जिनमें केंद्र सरकार को इन अधिकारियों को सेवा से मुक्त करने से रोका गया है, जब तक याचिकाओं का निपटारा नहीं हो जाता।

9 मई को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन सेना अधिकारियों को सेवा से न निकाला जाए, क्योंकि इससे उनकी मनोबल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वरा भाटी ने कहा कि यह प्रशासनिक निर्णय है और सेना को युवा बनाए रखने की नीति के तहत लिया गया है।

मेनका गुरुस्वामी ने कर्नल गीता शर्मा की ओर से बताया कि कर्नल सोफिया कुरैशी, जिन्होंने मई 7 और 8 को ऑपरेशन सिंदूर पर मीडिया को जानकारी दी थी, भी इस मामले में हैं।

महिला अधिकारियों ने 2020 के सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश पर भरोसा जताया है, जिसमें सेना को उन्हें स्थायी कमीशन देने का निर्देश दिया गया था। फरवरी 17, 2020 के उस आदेश में कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं को सेना में कमांड पदों से पूरी तरह वंचित रखना असंवैधानिक है और बिना उचित कारण उन्हें कमांड पदों से बाहर रखना कानूनन टिकाऊ नहीं।

कोर्ट ने महिला अधिकारियों की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कर्नल कुरैशी का उदाहरण दिया।

2020 के फैसले के बाद से सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के मुद्दे पर कई आदेश जारी किये हैं, तथा नौसेना, भारतीय वायु सेना और कोस्ट गार्ड के मामलों में भी इसी तरह के आदेश दिये गए हैं।

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