नई दिल्ली, 21 अगस्त (PTI) – सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र से पूछा कि यदि संवैधानिक कर्ता राज्य विधायिकाओं द्वारा पारित विधेयकों पर कार्रवाई करने से इनकार कर दें या राज्यपाल द्वारा कोई कार्यवाही न की जाए, तो क्या संवैधानिक अदालतों के हाथ बंधे रह सकते हैं।
इस सवाल पर पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के मुखिया मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई ने कहा, “अगर संवैधानिक कर्ता बिना कारण अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करते, तो क्या संवैधानिक अदालत के हाथ बंधे रह सकते हैं?”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब दिया कि सभी समस्याओं का हल अदालतों में संभव नहीं है, और लोकतंत्र में संवाद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि राजनीतिक समाधान खोजने चाहिए और अदालतों का दखल सीमित होना चाहिए।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने पूछा कि अगर राज्यपाल द्वारा कोई निष्क्रियता हो, और राज्य कोर्ट का रुख करे, तो क्या उस निष्क्रियता की न्यायिक समीक्षा पूरी तरह असंभव है और इसका समाधान क्या हो सकता है?
मेहता ने कहा कि कुछ लचीलापन होना चाहिए। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि कई बार मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच संवाद से समस्या का समाधान निकाला जाता है।
उन्होंने आगे कहा कि संसद संविधान में सुधार करके राज्यपाल के कार्यों के लिए समयसीमा निर्धारित कर सकती है, लेकिन उसे अदालत के फैसले से नहीं किया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा, “अगर कोई त्रुटि हुई है तो उसका उपचार होना चाहिए। यह अदालत संविधान की संरक्षक है और इसे संविधान की शाब्दिक व्याख्या करनी होगी।” न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सहमति व्यक्त की कि यदि व्याख्या का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय के पास है तो कानून की व्याख्या अदालत द्वारा ही होनी चाहिए।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि संवैधानिक कर्ताओं के साथ निपटते समय कुछ लचीलापन होना चाहिए और अदालत हमेशा बिना फैसला सुनाए ही कुछ निर्देश दती रहती है।
यह सुनवाई राष्ट्रपति संदर्भ से संबंधित है, जिसमें मई में राष्ट्रपति द्रौपदी मर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के अंतर्गत सवाल उठाया था कि क्या न्यायालय राष्ट्रपति को राज्य विधायिकाओं द्वारा पारित विधेयकों से निपटने के लिए समयसीमा निर्धारित करने का अधिकार दे सकता है।
8 अप्रैल के तमिलनाडु राज्यपाल मामले के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार निर्धारित किया कि राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा अतिरक्षित विधेयकों पर तीन महीने के अंदर निर्णय लेना चाहिए।
सुनवाई जारी है।
पहले मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा था कि न्यायिक सक्रियता न्यायिक आतंकवाद नहीं बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि चुनावी प्रतिनिधियों के अनुभव का अवमूल्यन नहीं होना चाहिए।
श्रेणी: ब्रेकिंग न्यूज
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