नई दिल्ली, 20 अगस्त (PTI) – सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को यह सवाल उठाया कि क्या देश में आज भी वही सामंजस्य और परामर्श की भावना राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच है, जैसा संविधान निर्माण के समय कल्पना की गई थी।
मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी उस वक्त की, जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राज्यपाल की नियुक्ति और शक्तियों पर संविधान सभा की बहसों का हवाला दिया। पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और एएस चंदुरकर भी शामिल थे।
मेहता ने कोर्ट को बताया कि अलग-अलग आलोचनाओं के बावजूद, राज्यपाल का पद राजनीतिक शरण पाने वालों के लिए नहीं, बल्कि इसमें संविधान के तहत विशिष्ट शक्तियां और जिम्मेदारियां निहित हैं।
यह सुनवाई राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए एक संदर्भ (Presidential Reference) पर हो रही है, जिसमें यह संवैधानिक सवाल उठाया गया है कि क्या न्यायालय राज्यपाल और राष्ट्रपति को राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर कार्रवाई के लिए समय सीमा निर्धारित कर सकता है।
मंगलवार को कोर्ट ने केंद्र और अटॉर्नी जनरल से पूछा था कि विधानसभा द्वारा पारित बिलों को राज्यपाल के पास लंबित रखने की समस्या पर क्या किया जाना चाहिए क्योंकि कुछ मामलों में यह 2020 से लंबित हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि वह अपने विचार सिर्फ कानून के संबंध में रखेगा, न कि तमिलनाडु केस के 8 अप्रैल के फैसले पर, जिसमें राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए बिलों पर समयसीमा तय की गई थी।
कोर्ट ने तमिलनाडु और केरल सरकारों द्वारा राष्ट्रपति संदर्भ की सुनवाई-योग्यता (maintainability) पर उठाए गए प्रारंभिक आपत्तियों पर कहा कि वह अपनी सलाहकार क्षेत्राधिकार (advisory jurisdiction) का प्रयोग करेगा, क्योंकि अदालत यहां अपीलीय क्षेत्राधिकार में नहीं बैठी है।
मई में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि क्या न्यायालय के आदेश राष्ट्रपति के विवेकाधिकार पर कार्यावधि तय कर सकते हैं जबकि वे राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित बिलों से संबंधित हों।
केंद्र सरकार ने लिखित जवाब में कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए निश्चित समयसीमा तय करना संविधान के किसी अंग द्वारा उस अधिकार को ग्रहण करने जैसा होगा, जो उसे संविधान ने नहीं दिया है और इससे ‘संवैधानिक अव्यवस्था’ उत्पन्न होगी।
8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार यह कहा था कि तमिलनाडु विधानसभा के पारित विधेयकों पर राज्यपाल द्वारा विचारार्थ राष्ट्रपति को भेजे गए बिलों का राष्ट्रपति को तीन माह के भीतर निर्णय करना चाहिए।
राष्ट्रपति मुर्मू ने एक पांच पृष्ठी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट से 14 सवालों के उत्तर मांगे हैं, जिनमें राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों (अनुच्छेद 200 एवं 201) के तहत राज्य विधानसभाओं से आए बिलों पर फैसला करने का अधिकार भी शामिल है।
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