नई दिल्ली, 21 जुलाई (PTI) — सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) “सभी हदें पार कर रही है”, क्योंकि एजेंसी जांच के दौरान वकीलों को केवल कानूनी सलाह देने या मुवकिल का प्रतिनिधित्व करने पर समन भेज रही है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच—मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन—ने इस पर स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा कि ऐसी कार्रवाई वकीलों की स्वतंत्रता और संविधान में दी गई ‘लॉयर-क्लाइंट प्रिविलेज’ का सीधा उल्लंघन है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा:
“क्लाइंट और वकील के बीच की बातचीत एक विशेषाधिकार प्राप्त कम्युनिकेशन है। ऐसे में वकीलों को नोटिस कैसे दिया जा सकता है…? एजेंसी सभी हदें पार कर रही है।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि,
“ऐसी कार्रवाइयों से कानून व्यवसाय पर असहनीय दबाव और डर का माहौल बन सकता है — गाइडलाइंस बनाई जानी चाहिए।”
यह टिप्पणी वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार और अन्य कानूनी पेशेवरों को मिली ED की नोटिसों की पृष्ठभूमि में आई है, जिसमें दातार जैसे सम्मानित वकीलों से उनकी पेशेवर राय को लेकर पूछताछ की गई थी।
कानूनी बिरादरी और संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिक्रिया:
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सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) व बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) सहित देशभर के वकीलों और एसोसिएशनों ने इस प्रवृत्ति की आलोचना की है।
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SCAORA ने कहा, “यह स्वतंत्र न्यायपालिका और वकीलों की पेशेवर स्वतंत्रता के लिए सीधा खतरा है, और रूल ऑफ लॉ की नींव को हिलाने वाला है।”
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SCAORA ने ये भी जोड़ा, “ऐसी कार्रवाई ‘इंस्टीट्यूशनल जस्टिस सिस्टम’ पर हमला है और अंततः आम नागरिक के स्वतंत्र कानूनी सलाह पाने के अधिकार पर बुरा असर डालती है।”
सरकार और जांच एजेंसियों की प्रतिक्रिया:
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अटॉर्नी जनरल आर वेंकटारमणि व सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस मुद्दे को उच्च स्तर पर संज्ञान में लिया गया है।
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उन्होंने कहा, “वकीलों को सिर्फ लीगल ओपिनियन देने के लिए समन नहीं भेजा जा सकता। एजेंसी को इस बारे में निर्देशित कर दिया गया है।”
संविधानिक संदर्भ
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अदालत ने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई मौकों पर स्पष्ट कर चुकी है कि केवल पेशेवर सलाह देने के लिए वकीलों को उनके क्लाइंट की कथित ग़लतियों के लिए कानूनी ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता。
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट इस संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश (guidelines) बनाने पर विचार कर रही है, ताकि भविष्य में जांच एजेंसियाँ वकीलों को मनमाने ढंग से समन न भेज सकें और देश के “न्यायिक तंत्र की स्वतंत्रता” अक्षुण्ण रह सके।
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